रविवार, 5 जुलाई 2015

          मीडिया में हिन्दी
भारतभूमि के गौरवशाली अतीत में हिन्दी भाषा के अभिव्यक्ति में प्रयोग की एक सुदीर्घ और विस्तृत परंपरा मिलती है। साहित्यकारों और इतिहासकारों के मतानुसार हिन्दी भाषा का उद्गम १०वीं शताब्दी के आसपास माना गया है और तब से लेकर आजतक हिन्दी भाषा पूरे भारत में बोली और समझी जाती रही है। हिन्दी  भाषा की बढ़ती जा रही लोकप्रियता का अंदाजा इसी से ही लगाया जा सकता है कि सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में हिन्दी  सीखने वालों की संख्या में जबरदस्त बढ़ोत्तरी हुई है। पिछले १०-१२ वर्षों में हिन्दी  बोलने वालों की संख्या में कई गुना वृद्धि दर्ज की गई है।  देश में विदेशियों के आधिपत्य एवं गुलामी के दिनों में यहाँ अँग्रेज़ी शासनकाल होने की वजह से, अँग्रेज़ी का प्रचलन बढ़ गया था। लेकिन स्वतंत्रता के पश्चात देश के कई हिस्सों को एकजुट करने के लिए एक ऐसी भाषा की ज़रूरत थी जो सर्वाधिक बोली जाती है, जिसे सीखना और समझना दोनों ही आसान हों। तब विकल्प के रूप में हमारे समक्ष एक ही भाषा थी जो अपने लक्ष्य में सफल सिद्ध हो सकती थी वो थी हिन्दी। आज भारत का लगभग पूरा जनआवाम हिन्दी भाषा को समझ या बोल सकता है। लेकिन यह बड़े दुःख की बात है कि इस गौरवमयी भाषा को अब तक राष्ट्रभाषा का दर्जा नहीं मिल सका और यह आज भी राजभाषा और संपर्कभाषा ही बनी हुई है। विश्व में प्रत्येक सम्मुन्नत, स्वतंत्र और स्वाभिमानी राष्ट्र की अपनी एक राष्ट्रभाषा है। इंगलैंड, अमेरिका, रूस, जर्मनी, चीन, फ़्रांस जैसे सभी देशों में वहाँ की एक व्यापक प्रचलित भाषा राष्ट्रभाषा के रूप में व्यवहृत होती है। पर अफ़सोस कि हमारे देश भारत में आज भी कोई राष्ट्रभाषा नहीं है। इसका कारण चाहे हमारी सैकड़ों वर्षों की दासता हो या क्षेत्रीय राजनीति या कुछ और, लेकिन यह सर्वविदित है कि हमारी हिन्दी विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र की सबसे लोकप्रिय भाषा बनी हुई है और इसमें कोई संदेह नहीं कि हिन्दी के क्षेत्र में काफी विकास और विस्तार हुआ है। हिन्दी के प्रयोग को बढ़ाने के लिये कई महत्वपूर्ण और रचनात्मक कदम उठाये गये हैं और हमें काफी हद तक सफलता भी मिली है। भूमंडलीकरण के इस दौर में हिन्दी कई क्षेत्रों में अपने पैर जमाती नजर आती है जिसमें मीडिया का क्षेत्र एक प्रमुख क्षेत्र के रूप में उभर कर सामने आ रहा है.
मीडिया और जनसंचार में हिन्दी   :
     मनुष्य की भाषायी अथवा कलात्मक अभिव्यक्ति को एक से अधिक व्यक्तियों तथा स्थानों तक पहुँचाने की व्यवस्था को जनसंचार का नाम दिया गया है। आधुनिक युग में इस जनसंचार शब्द का स्थान ‘मीडिया’ शब्द ने ले लिया है जो अंग्रेजी के ‘मीडियम’ शब्द से व्युत्पन्न माना जा सकता है। पिछली कई सदियों से प्रिंट मीडिया इस संदर्भ में अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता आ रहा है, जहाँ हमारी लिखित अभिव्यक्ति पहले तो पाठ्य रूप में प्रसारित होती रही तथा बाद में छायाचित्रों का समावेश संभव होने पर दृश्य अभिव्यक्ति भी प्रिंट मीडिया के द्वारा संभव हो सकी। बाद में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने भी साथ-साथ अपनी जगह बनाई, जहाँ पहले तो श्रव्य अभिव्यक्ति को रेडियो के माध्यम से प्रसारित करना संभव हुआ तथा बाद में टेलीविजन के माध्यम से श्रव्य-दृश्य दोनों ही अभिव्यक्तियों का प्रसारण संभव हो सका। प्रिंट मीडिया की अपेक्षा यहाँ की दृश्य अभिव्यक्ति अधिक प्रभावी हुई, क्योंकि यहाँ चलायमान दृश्य अभिव्यक्ति भी संभव हुई। भारत वर्ष में प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मिडिया के सम्प्रेषक भाषा के रूप में हिन्दी और अंग्रेजी दोनों का  प्रयोग प्रमुखता से हुआ। बल्कि यह कहा जा  सकता है कि हिन्दी बड़े ही सशक्त रूप में जनसंचार की भाषा बनी और इसका विस्तारीकरण होता गया। बीसवीं सदी में कंप्यूटर के विकास के साथ-साथ एक नए माध्यम ने जन्म लिया, जो डिजिटल था और इस प्रकार डिजिटल मिडिया का सूत्रपात हुआ । प्रारंभ में डाटा के सुविधाजनक आदान-प्रदान के लिए शुरू की गई कंप्यूटर आधारित सीमित इंटरनेट सेवा ने आज विश्वव्यापी रूप अख्तियार कर लिया है। इंटरनेट के प्रचार-प्रसार और निरंतर तकनीकी विकास ने एक ऐसी वेब मीडिया को जन्म दिया, जहाँ अभिव्यक्ति के पाठ्य, दृश्य, श्रव्य एवं दृश्य-श्रव्य सभी रूपों का एक साथ क्षणमात्र में प्रसारण संभव हुआ और इसे ‘न्यू मिडिया’ का नाम दिया गया। ‘न्यू मीडिया’ पर अपनी अभिव्यक्ति के प्रकाशन-प्रसारण के अनेक रूप हैं। कोई अपनी स्वतंत्र ‘वेबसाइट’ निर्मित कर वेब मीडिया पर अपना एक निश्चित पता आौर स्थान निर्धारित कर अपनी अभिव्यक्तियों को प्रकाशित-प्रसारित कर सकता है। अन्यथा बहुत-सी ऐसी वेबसाइटें उपलब्ध हैं, जहाँ कोई भी अपने लिए पता और स्थान आरक्षित कर सकता है। अपने निर्धारित पते के माध्यम से कोई भी इन वेबसाइटों पर अपने लिए उपलब्ध स्थान का उपयोग करते हुए अपनी सूचनात्मक, रचनात्मक, कलात्मक अभिव्यक्ति के पाठ्य अथवा ऑडियो/वीडियो डिजिटल रूप को अपलोड कर सकता है, जो तत्क्षण दुनिया में कहीं भी देखे-सुने जाने के लिए उपलब्ध हो जाती है। बहुत-सी वेबसाइटें संवाद के लिए समूह-निर्माण की सुविधा देती हैं, जहाँ समान विचारों अथवा उद्देश्यों वाले लोग एक-दूसरे से जुड़कर संवाद कायम कर सकें। आज के संदर्भ में ‘वेबग्रुप’ की इस अवधारणा से तहत फेसबुक और ट्विटर जैसी ऐसी वेबसाइटें भी मौजूद हैं, जो प्रायः पूरी तरह समूह-संवाद केन्द्रित हैं। दूसरे शब्दों में इसे सोशल नेटवर्किंग का नाम दिया गया है। ‘न्यू मीडिया’ से जो एक अन्य सर्वाधिक लोकप्रिय उपक्रम जुड़ा है, वह है ‘ब्लॉगिंग’ का। अभिव्यक्ति के अनुसार ही ब्लॉग पाठ्य ब्लॉग, फोटो ब्लॉग, वीडियो ब्लॉग (वोडकास्ट), म्यूजिक ब्लॉग, रेडियो ब्लॉग (पोडकास्ट), कार्टून ब्लॉग आदि किसी भी तरह के हो सकते हैं। अधिकांश लोग न्यू मीडिया का अर्थ इंटरनेट के जरिए होने वाली पत्रकारिता से लगाते हैं। लेकिन न्यू मीडिया समाचारों, लेखों, सृजनात्मक लेखन या पत्रकारिता तक सीमित नहीं है। वास्तव में न्यू मीडिया की परिभाषा पारंपरिक मीडिया की तर्ज पर दी ही नहीं जा सकती। न सिर्फ समाचार पत्रों की वेबसाइटें और पोर्टल न्यू मीडिया के दायरे में आते हैं बल्कि नौकरी ढूंढने वाली वेबसाइट, रिश्ते तलाशने वाले पोर्टल, ब्लॉग, स्ट्रीमिंग ऑडियो-वीडियो, ईमेल, चैटिंग, इंटरनेट-फोन, इंटरनेट पर होने वाली खरीददारी, नीलामी, फिल्मों की सीडी-डीवीडी, डिजिटल कैमरे से लिए फोटोग्राफ, इंटरनेट सर्वेक्षण, इंटरनेट आधारित चर्चा के मंच, दोस्त बनाने वाली वेबसाइटें और सॉफ्टवेयर तक न्यू मीडिया का हिस्सा हैं। आज हमारे लिये यह बड़े हर्ष की बात है कि उपरोक्त सभी माध्यमों में हिन्दी पदार्पण किया है और यह अपने प्रगति के राह पर उत्तरोतर आगे की ओर बढ़ती जा रही है.
वेब का हिन्दी  पाठक-वर्ग आरंभिक दौर में अधिकतर ऐसे लोग थे जो वेब पर अपनी भाषा पढ़ना चाहते थे, कुछ ऐसे लोग थे जो विदेशों में बसे हुए थे किंतु अपनी भाषा से जुड़े रहना चाहते थे या कुछ ऐसे लोग जिन्हें किन्हीं कारणों से हिन्दी  सामग्री उपलब्ध नहीं थी जिसके कारण वे किसी भी तरह की हिन्दी  सामग्री पढ़ने के लिए तैयार थे। आज परिस्थितियां बदल गई हैं, मुख्यधारा वाला मीडिया आनलाइन उपलब्ध है और पाठक के पास सामग्री चयनित करने का विकल्प है। विशुद्ध साहित्यिक रुचि रखने वाले लोग भी अब वेब पाठक हैं और वे वेब पर लंबी हिन्दी कहानियां व साहित्य पढ़ते हैं। उनकी सुविधा को देखते हुए भविष्य में साहित्य डाऊनलोड करने का प्रावधान अधिक उपयोग किया जाएगा ऐसी प्रबल संभावना है।  साहित्यिक वेबसाइटें स्तरीय साहित्य का प्रकाशन कर रही हैं और वे निःसंदेह साहित्यिक भाषा का उपयोग कर रही हैं लेकिन उनके पास ऐसा पाठक वर्ग तैयार हो चुका है जो साहित्यिक भाषा को वरीयता देता है।
यदि बात जनसंचार के माध्यमों में भागीदारी की करें तो हिन्दी का स्थान भारत में ही नहीं विश्व में भी सर्वोपरि है। फिर बात समाचार पत्र की हो या रेडियो की, या उपग्रह चैनल, सोशल साइट्स और ब्लॉग की। आज विश्व में सबसे ज्यादा पढ़े जानेवाले समाचार पत्रों में आधे से अधिक हिन्दी के हैं। यदि भारत की बात की जाये तो यहाँ सर्वाधिक समाचार पत्र हिन्दी भाषा में ही प्रकाशित होते हैं। इसका आशय यही है कि पढ़ा-लिखा वर्ग भी हिन्दी के महत्त्व को समझ रहा है। वस्तुस्थिति यह है कि आज भारतीय उपमहाद्वीप में ही नहीं बल्कि दक्षिण पूर्व एशिया, मॉरीशस, चीन, जापान, कोरिया, मध्य एशिया,  अफ्रीका, यूरोप, कनाडा तथा अमेरिका तक में हिन्दी कार्यक्रम उपग्रह चैनलों के जरिए प्रसारित हो रहे हैं और भारी तादाद में उन्हें दर्शक भी मिल रहे हैं। आज मॉरीशस में हिन्दी  सात चैनलों के माध्यम से धूम मचाए हुए है। विगत दो दशकों  में एफ.एम. रेडियो के विकास से हिन्दी  कार्यक्रमों का नया श्रोता वर्ग पैदा हो गया है। बी बी सी लन्दन, रेडियो रूस, रेडियो डॉयचेवेले जैसे कई महत्वपूर्ण रेडियो चैनल हैं जो कई दशकों से हिन्दी में कार्यक्रम प्रस्तुत करते आ रहे हैं जिससे हिन्दी के विस्तार को काफी बढ़ावा मिला है। फिज़ी में ‘रेडियो नवरंग’ ऐसा रेडियो स्टेशन है, जो २४ घण्टे हिन्दी  कार्यक्रम पेश कर रहा है। भारत में टेलीविजन के समाचार के चैनल की बात की जाए तो अधिकतर चैनल हिन्दी भाषा में ही समाचार प्रस्तुत करते हैं और दिन प्रतिदिन इनकी संख्या में वृद्धि हो रही है। इंटरनेट पर हिन्दी के अनेक पोर्टल हैं। फेसबुक, व्हाट्स अप्प, ट्विटर, ब्लॉग आदि पर हिन्दी भाषा देवनागरी लिपि में भी लिखी जाने लगी है जो कुछ वर्ष पूर्व रोमन में लिखी जाती रही थी। इंटरनेट पर हिन्दी ब्लॉग की बाढ़ सी आ रखी है। देश ही नहीं विदेशों से भी ब्लॉग लेखन का काम हिन्दी में हो रहा है और साथ ही साथ लोग विदेशों में इन्हें बड़ी सजगता से पढ़ भी रहें हैं। इस प्रकार इंटरनेट जैसे वैश्विक माध्यम पर हिन्दी में सोशल साइट्स, ब्लॉग्स आदि की उपस्थिति हिन्दी भाषा के विस्तार को सहजता से अभिलक्षित करती है।
इस प्रकार हम देखते हैं कि काफी अल्प समय में हिन्दी ने डिजिटल मिडिया के क्षेत्र में जिस प्रकार से अपना एक अहम स्थान बनाया है, नया प्रतीमान स्थापित किया है। उससे आज के समय में जनसंपर्क के क्षेत्र में हिन्दी भाषा का भविष्य उज्जवल दिखाई दे रहा है। साथ ही यह स्पष्ट होता है कि किसी न किसी रूप में हिन्दी का महत्व बढ़ा है और उसने अपने क्षेत्र में परिवृद्धि की है।
                                                                     -सुस्मित सौरभ                                                      

सोमवार, 27 अप्रैल 2015



                                                            आलेख
                        हिंदी कहानियों में वृद्ध समस्या

        अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते करते मनुष्य जीवन की सांध्य बेला में कब पहुंच जाता है उसे महसूस ही नहीं होता और जब तक उसे इसका एहसास होता है वह पाता है कि जीवन बंद मुट्ठी में दबी रेत की तरह फिसल चुका है। बाल्यावस्था के पश्चात होश संभालते ही मनुष्य अपने आप को अनेक जिम्मेदारियों से घिरा हुआ पाता है। इन जिम्मेदारियों का एक एक कर सामना करने के पश्चात जब उसे लगता है कि कमोबेस उसकी सारी समस्याओं का निवारण अब हो चुका है तब तक वह एक ऐसी अवस्था में पहुँच जाता है जो उसके जीवन की सांध्य बेला या दूसरे शब्दों में वृद्धावस्था होती है। जीवन की इस अवस्था में मनुष्य को आराम की आवश्यकता होती है, एक सहारे की जरुरत होती है। उम्र के इस मोड़ पर वह आसरे के लिए अपनी संतान की ओर बड़ी ही आशा भरी दृष्टि से देखता है जिस सन्तान की हर जरूरत, हर सुख-दुःख का उसने जीवन भर ध्यान रखा। लेकिन प्रश्न उठता है कि क्या अपनों का यह सहारा उस वृद्ध मनुष्य को मिलता है तो एकाध उत्तरों को छोड़ अधिकांशतः जवाब होते हैं – नहीं। जीवन भर हमें सुरक्षा और संरक्षण देने वाले हाथ जो हमारी ऊँगली पकड़ कर हमें चलना सिखाते हैं, उसी का सहारा बनने का जब वक्त आता है तो हम अपने हाथ पीछे क्यों खिंच लेते हैं? आखिर इस कहावत का सृजन क्यों होता है कि दो माता पिता दस बच्चों को तो पाल सकते हैं लेकिन दस बच्चे दो माता पिता को नहीं पाल सकते। उनके लिए वृद्धावस्था भत्ता और वृद्धाश्रम की आवश्यकता क्यों पड़ने लगती है? जीवन की  इस अवस्था में पहुँचकर घर के बुजुर्ग अपने आप को अलग-थलग क्यों महसूस करने लगते हैं? मनुष्य के वृद्धावस्था का करुण वर्णन शास्त्रों में भी मिलता है। भर्तृहरी ने वैराग्य शतक में वृद्धावस्था का चित्रण करते हुए लिखा है – “शरीर पर झुर्रियाँ पड़ गयी हैं, चलने- फिरने का सामर्थ्य जा चुका है। दांत टूट गए हैं, दृष्टि नष्ट हो गयी है। पुत्र शत्रुवत व्यवहार करते हैं।” भारतीय धर्म, दर्शन संन्यास और वानप्रस्थ के महत्त्व का महिमामंडन करते हैं तो सारी आचार संहिता स्पष्ट होती है। जीवन भर कमाते- जोड़ते रहो, दूसरे के सुख –दुःख के भागी बनो और जीवन के अंतिम समय में जब शरीर दुर्बल और निष्क्रिय हो जाये तो जंगल में धकेल दिये जाओ। इस व्याख्या से तो दीर्घ जीवन अभिशाप सा प्रतीत होता है। आज के परिपेक्ष्य में यदि कहा जाये तो स्वार्थपरायणता, भौतिकवादी जीवनशैली, मूल्य में टूटन जैसे तत्वों के साथ साथ संयुक्त परिवार का एकल परिवार में क्षरण जो समाज में अकेलेपन को जन्म देता है, भारतीय समाज में वृद्ध समस्या का एक प्रमुख कारण है और इसके पीछे हमारा और आपका ही हाथ है।

        हिंदी कहानियों के गौरवमयी इतिहास में समाज की प्रमुख समस्याओं और ज्वलंत मुद्दों को सशक्त और सजग रूप से प्रस्तुत करने की एक विस्तृत परंपरा मिलती है। बात यदि हिन्दी कहानियों में वृद्ध समस्या से जुड़े लेखन की करें तो यह कोई नया विषय नहीं है। आरम्भ से ही हिन्दी लेखकों की लेखनी इस विषय से जुड़ी कहानियों की रचना करती रही है फिर चाहे वो मुंशी प्रेमचन्द हों या भीष्म साहनी या उषा प्रियंवदा हों या मनीषा कुलश्रेष्ठ। सभी ने अपनी कहानियों में वृद्ध जीवन की भावनाओं, उनकी कठिनाइयों को कहीं न कहीं छुआ जरुर है। हिंदी कहानी में वृद्धों की समस्याओं को अनेक परिप्रेक्ष्यों चित्रित किया गया है। समाज और परिवार में वृद्ध जनों की अवमूल्यित स्थिति का निरूपण अनेक सन्दर्भों में देखने को मिलता है। वृद्धों के जायदाद से जुड़ी समस्या को आलोकित करती मुंशी प्रेमचन्द की ‘बूढ़ी  काकी’ एक मिसाल कायम करती है। इस कहानी की मुख्य समस्या की शुरुआत होती है जब अमीर विधवा बुढ़िया बेटों की मृत्यु के बाद अपनी जायदाद अपने भतीजे बुद्धिराम के नाम लिखती है। काकी की संपत्ति हथिया कर उसी के घर में पोते का तिलक समारोह होता है, शहनाइयाँ बजती हैं, हलवाई तरह तरह के पकवान बनाते हैं और काकी अपमानित की जाती है, घसीटी जाती है। क्षुधातुर, हतज्ञान बुढ़िया कूड़े से जूठन बीन कर खाने को अभिशप्त है। उषा प्रियंवदा की कहानी ‘वापसी’ वृद्ध पुरुष के दर्द, टीस को अभिव्यक्त करती है। पैंतीस साल तक स्वयं छोटे छोटे स्टेशनों पर रहकर, परिवार को शहर में रखकर उसके सुख सुविधा का हर सामान जुटाने वाले गजाधर बाबू रिटायर्मेंट के बाद अपने पुत्रों, बेटी, बहू यहाँ तक कि पत्नी की नजर में भी घर में पड़े एक फालतू सामान की तरह हो जाते हैं जिसके लिए न तो घर में जगह है और न ही दिल में। गजाधर बाबू की स्थिति उस चारपाई की तरह हो जाती ही जो कभी ड्राईंग रूम रहती है तो कभी रजाइयों के बीच तो कभी आचार के मर्तबानों के बीच। कुछ यही स्थिति भीष्म साहनी की कहानी ‘चीफ की दावत’ के माँ की है। उसे भी घर के फालतू सामान जैसा ही रखा जाता है और उसे किसी से बात करने की इजाजत नहीं है। भीष्म साहनी की दूसरी कहानी ‘यादें’ वृद्धों की उपेक्षा और वृद्धावस्था में उनकी दोस्ती की कथा का वर्णन है। वृद्धों की पारिवरिक और सामाजिक स्थिति को उजागर करती है चन्द्रकिशोर जायसवाल की कहानी ‘मानबोध बाबू’। एक यात्रा के दौरान दो वृद्धों की बातचीत कहीं न कहीं उनके सामाजिक और पारिवारिक जीवन में घुले दर्द को दिखाती है और बताती है कि लोगों को वृद्ध नहीं बल्कि उनकी जायदाद प्रिय होती है। रिटायर्मेंट के बाद वृद्ध यदि गाँव में रहे तो उनकी मूलभूत आवश्यकताएं पूरी नहीं होती और यदि अपनी सारी जायदाद बेचकर सन्तान के पास महानगरों में जाएँ तो सारी कमाई सन्तान के हाथ में देनी पड़ती है। यदि वे ऐसा नहीं करते तो फिर उनका शेष जीवन नारकीय हो जाता है। नव कथाकार उपासना की कहानी ‘कार्तिक का पहला फूल’ में एक वृद्ध ने एकाकीपन को दूर करने के लिए अपने आप को बागवानी में व्यस्त कर रखा है और उसके द्वारा लगाये गये गुड़हल के पौधे के पहले फूल की प्रतीक्षा करता रहता है। जिस दिन उसके बगिये का पहला फूल खिलता है वृद्ध पुलकित हो उठता है लेकिन कुछ पल पश्चात यह फूल उसकी बहू द्वारा तोड़ लिया जाता है। फूल का टूटना वृद्ध के मानसिक व्यथा का कारण बन जाता है। सूर्यबाला की ‘सांझवती’ कहानी वृद्धों में उनके नकारेपन के एहसास की कहानी है। अस्सी वर्ष का वृद्ध अपनी बहत्तर वर्षीय पत्नी से मिलने के लिए सात कोस पैदल चलता है। हालाँकि उसके बेटे के पास कार है, ड्राइवर भी है लेकिन वो सब बेटे के अपने बीबी बच्चों के लिए है न की माता पिता के लिए। जाहिर सी बात है कि परिवारों में वृद्ध त्रासद जीवन जीने को मजबूर हैं। उनमें जीवन को लेकर उदासीनता है और वे आत्महत्या तक के लिए प्रयासरत दिखाई पड़ते हैं।
        वृद्ध लाचार होते हैं और इस अवस्था में उन्हें एक सहारे की आवश्यकता होती है लेकिन इसका मतलब ये तो नहीं कि वे बोझ हैं। बुजुर्ग वृक्ष भले ही फल न दे पर उसकी छाया तो हमारे ऊपर सदा ही बनी रहती है। वे घर परिवार को जोड़कर रखने में सहायक होते हैं। वे घर के बच्चों को शिष्टाचार, पारिवारिक इतिहास, धार्मिक एवं सांस्कृतिक मूल्यों से परिचित कराते हैं और उनके मानसिक विकास में सहायक होते हैं। मनीषा कुलश्रेष्ठ की ‘प्रेतकामना’ मुंबई के सी बीच पर बने तीन कमरों के फ़्लैट में अकेला जीवन गुजारते के विधुर की कहानी है जो कभी जे एन यू में एन्थ्रोपोलोजी के विभागाध्यक्ष थे। आज उनका बेटा इसी शहर में अलग रहता है, बेटी कलकत्ता में है और पत्नी की मृत्यु हो चुकी है। उनके समक्ष न तो समाज है, न परिवार और न ही पद- प्रतिष्ठा। कुछ है तो सिर्फ अकेलापन, एकाकीपन। आज हमारे बुजुर्गों के सामने एक बड़ी समस्या है उनके अकेलेपन की। आज की व्यस्त दुनिया में किसी के पास उनके लिए समय नहीं है। बुजुर्गों का कोई हमदर्द हो सकता है तो वो दूसरा बुजुर्ग ही हो सकता है ऐसी हमारी मान्यता बन चुकी है। आज यह आलम है की सम्बन्धगत अकेलापन वृद्धों-बुजुर्गों को गोद गोद कर खा रहा है और समाज में बुजुर्गों के साथ बढ़ते अपराध उनके लिए भय और चिंता का कारण बन रहे हैं। राजी सेठ की कहानी ‘इन दिनों’ वृद्धावस्था के इसी दर्द को आवाज देती है। यह कहानी रोजी-रोटी की तलाश में परदेश जा चुके बेटे –बेटियों के पीछे अकेले पड़ गये बूढ़े माता पिता की कहानी है जिनके जीवन में शून्यता और संत्रास ने घर कर लिया है। पिता को दैनिक अख़बार पढ़कर यह लगता है कि मृत्यु से पहले वे कहीं चोर डाकुओं के शिकार न बन जायें। घर में नौकर की उपस्थिति और उनके पत्नी की बेफिक्री उन्हें सदा ही चिंतित किये रहती है। उन्हें लगता है की बेटों के साथ उनके संरक्षण में पति-पत्नी की जिन्दगी ज्यादा सुरक्षित है। राजी सेठ की दूसरी कहानी ‘मार्था का देश’ विदेश चले गये बेटे और उसके पत्रों का इन्तजार करती माँ का दर्द बयां करती है। माँ इतनी उपेक्षित हो जाती है कि बेटे के विदेश से वापस लौट आने के बाद उसके जाने का इंतजार करने लगती है। आज के परिपेक्ष्य में कहानीकारों ने बुजुर्गों के अकेलेपन की समस्या को कहीं न कहीं परिवार के सदस्यों के विदेश गमन से जोड़ने की कोशिश की है। वृद्ध समस्या को केंद्र बनाकर कहानी लेखन के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण नाम सुषम बेदी का आता है। उनकी कहानी ‘झाड़’ में अमेरिका में जन्मे सात वर्षीय समीर को भारतीय संस्कृति से अवगत कराने के लिए, घरेलू शिष्टाचार और स्नेह ममत्व से सराबोर करने के लिये उसकी नानी मालती को अमेरिका बुलाया जाता है। लेकिन यह क्या? बच्चे को नानी में कोई दिलचस्पी नहीं है। उसके पास खेलने के लिए गेम्स, खाने के लिए फ़ास्ट फ़ूड और साथ देने के लिए बेबी सिटर है। समीर के जीवन में नानी शब्द की कोई अहमियत नहीं दिखती। उसे न तो नानी का बनाया खाना पसंद आता न ही उसके कपडे और न ही उसका स्नेहमयी बर्ताव बल्कि नानी तो समीर के लिए किसी एलियन की तरह है। सुषम बेदी की दूसरी कहानी ‘नाते’ में बेटा राज १७ वर्षों पहले अमेरिका में बस चुका है और उसने अपने भाइयों को भी वहां बुला लिया है। राज जब भी अपनी पत्नी के साथ भारत आता है तो उसके नाते रिश्तेदार उससे माँ बाप को अमेरिका ले जाने की बात कहते है। राज अपने माँ बाप को अमेरिका ले भी जाता है परन्तु पिता अपने अड़ियल स्वभाव के कारण वहां एडजस्ट नहीं कर पाते और वापस भारत लौट आते हैं। डॉ सूर्यबाला की कहानी ‘आखिरी विदा’ प्रवासी बेटे के अकेले माँ-बाप की कहानी है। यह सोचकर कि बेटा सात वर्षों के पश्चात भारत आ रहा है वे ख़ुशी से भर उठते हैं और बेटे के स्वागत की तैयारी में लग जाते हैं। लेकिन बूढ़े माँ-बाप एक टीस से तब भर जाते हैं जब उन्हें महसूस होता है कि बेटा अब उनसे संकोच करता है, औपचारिकता पूर्ण व्यवहार करता है। कुछ असहज सी बातचीत के बाद बेटा कुछ दिन पश्चात माँ-बाप की आँखों में एक अंतहीन इंतज़ार छोड़कर वापस विदेश चला जाता है। बूढ़े माँ-बाप के अकेलेपन के दर्द को इस कहानी में एक भावपूर्ण अभिव्यक्ति मिलती है। तेजेंद्र शर्मा की कहानी ‘पासपोर्ट के रंग’ प्रवासी भारतीय बुजुर्गों के मानसिक स्थिति की पड़ताल करती है। यह कहानी एक ऐसे व्यक्ति की कहानी है जो अपने देश से प्रेम करता है और सारी सुख सुविधाओं के बीच भी भारतीय नागरिकता न होने के कारण बेचैनी का अनुभव करता है। इस प्रकार उपर्युक्त कहानियों के संदर्भण से यह अभिलक्षित होता है कि प्रवासी या परदेश में रहने वाले लोगों के माँ-बाप की स्थिति घर के पहरेदार की हो जाती है जो बहन-भाई की शादियों, पति या पत्नी की मृत्यु के बाद एक बड़े घर में अकेले रह जाते हैं, वह घर जिसे उन्होंने अपनी मेहनत की कमाई की पाई-पाई जोड़कर बनाया था और जिसमें सपरिवार रहने का उनका पुराना सपना था। प्रतिभा पलायन का यह दौर यदि नहीं रुका तो मुझे लगता है कि कुछ दशकों के बाद भारत में घरों में हमारे बुजुर्ग चौकीदार की भूमिका में एकाकी जीवन व्यतीत करते नजर आयेंगे।
        समय तेजी से बदल रहा है और हम पाश्चात्य संस्कृति की ओर उन्मुख हो रहे है या  कुछ हद तक उसे अपने जीवन में उतार भी लिया है। लेकिन एक बात समझ में नहीं आती कि हम तो अपने जीवन में आधुनिक रहन सहन को प्रश्रय दे रहे हैं और अपने बुजुर्गों को हमने एक विशेष जीवन शैली के बंधन में बांध दिया है। दूसरे शब्दों में कहा जाये तो हमने उनके लिए एक ‘कोड ऑफ़ कंडक्ट’ बना डाला है। वृद्ध तीर्थाटन करें, भजन-कीर्तन करें, पत्र- पत्रिकायें पढ़ें, सुबह- शाम सैर को जायें, बागवानी करें तो ठीक लेकिन वृद्ध डिस्को जाते हैं, वेस्टर्न कपड़े और संगीत का शौक रखते हैं, विषमलिंगी मैत्री रखते हैं, पुनर्विवाह करते हैं तो वह गलत है। ऐसा क्यों? क्या वृद्ध होते ही मनुष्य देश के सामान्य नागरिक का अधिकार खो देता है? साहित्य समाज में घटित होने वाली सभी बातों को अपने अन्दर समाहित कर लेता है। आधुनिक कथाकारों ने उरोक्त वर्णित बिंदु को ध्यान में रखकर भी सहृदयता से लिखा है। अमरीक सिंह दीप की कहानी ‘तीर्थाटन’ की चौवन वर्षीय विधवा सुदेश जो बेटे-बेटी और नाती- नातिनों वाली है पर पुरुष के साथ तीर्थाटन पर चली जाती है। उसका यह कृत्य उसे उसके बेटों की नजर में कुल्टा, कुलच्छिनी, बेहया बना देता है और पूरा घर मारो, फूंको, काटो जैसे शब्दों से गूँज उठता है। इसका मतलब यही निकलता है कि विधवा को अपने ढंग से जीने का कोई हक़ नहीं क्योंकि उसके बेटे और बेटियों को ऐसी माँ चाहिए जो बीमार, झुर्रीदार चेहरे वाली हो, जो सफ़ेद, मैली, पैबंद वाली साड़ियाँ पहने, मंदिर में प्रवचन सुने, व्रत उपवास रखे। यदि यह विधवा ग़ज़ल सुने, मॉर्निग वाक पर जाये, रोमांटिक पत्रिकायें पढ़े तो यह बात उसके बेटे- बहुओं को नहीं पचती। कृष्णा अग्निहोत्री की कहानी ‘यह क्या जगह है दोस्तों’संगीतकार ऋतु की कहानी है। पति की मृत्यु के बाद बच्चे उसके फिल्म देखने, संगीत सुनने, रियाज करने, रेडियो प्रोग्राम देने यहाँ तक कि किसी से फोन पर बात करने और किसी शादी- पार्टी में जाने पर भी रोक लगा देते हैं। उसे अपने वाद्ययंत्र बेचकर कम्प्यूटर खरीदने की सलाह दी जाती है। कुछ वृद्ध-बुजुर्ग भी आधुनिक जीवन शैली को अपना नहीं पाते इसके पीछे चाहे उनका पारम्परिक जीवन मूल्य हो या अतीत का दर्द। कुछ इसी भाव को बयां करती है सुषम बेदी की कहानी ‘गुनाहगार’। यह कहानी एक साठ वर्ष की विधवा की कहानी है जो पुनर्विवाह नहीं करना चाहती। लेकिन उसके बेटी-दामाद उसे विकसित संस्कृति का हवाला देकर दूसरी शादी का विज्ञापन दे देते हैं। लेकिन वह अपने पति की छवि विज्ञापन वाले व्यक्ति में नहीं देख पाती। अपने परम्परागत भारतीय संस्कारों से लड़ती हुई उसकी आत्मा इस अंतर्द्वंद्व में पराजित हो जाती है और वह विज्ञापन वाले अख़बार को अपने हाथों से फाड़ देती है। मनीषा कुलश्रेष्ठ की कहानी ‘प्रेतकामना’ के विधुर डॉ पन्त के प्रेत से जीवन की कामनाएं तब लहरती हैं जब वे अपनी अमेरिका से लौटी पुराणी छात्रा को देखते हैं। उन दोनों में शारीरिक सम्बन्ध भी कायम होते हैं। अपने पिता की इस नई दुनिया को देखकर बेटे के की साडी श्रद्धा, प्यार और मोह निथर जाते हैं।मुशर्रफ आलम जौकी की कहानी ‘बाप और बेटा’ पिता के कुंठित मनोदशा का मनोविश्लेषण है। शादी के बाद पति और पिता बनते ही पुरुष मर्यादा की सीमा में बांध दिए जाते हैं। वृद्धावस्था तो एक ऐसी अवस्था है जिसमें दोस्तों की भी आवश्यकता अधिक होती है  लेकिन घर के लोग उन दोस्तों को बर्दास्त नहीं करते। अब तो लोग बुजुर्ग पति पत्नी को भी बाँट कर रखना चाहते हैं। विदेशों में लोग ८० वर्ष की उम्र में भी शादी करते हैं लेकिन भारत में यदि कोई वृद्ध अपने पसंद का एक पल भी जी ले तो लगता है जैसे आफत सी आ जाती है।
        उपरोक्त समस्याओं के साथ साथ हमारे भारत में वृद्धों से जुड़ी कई अन्य समस्याएं  भी देखने को मिलती हैं। उन्हें प्रताड़ित किया जाता है, कमरे में कैद कर भूखा रखा जाता है, उनसे मार पीट और जोर जबरदस्ती की जाती है यहाँ तक की उनसे भीख भी मंगवायी जाती  है। बीमारी और बुढ़ापा एक दूसरे के पूरक होते हैं। लगभग हर कहानी वृद्धों के मृत्यु का इंतजार कर रही संतानों को लेकर केन्द्रित दिखाई पड़ती है। इसी भाव को व्यक्त करती है निर्मल वर्मा की कहानी ‘बीच बहस में’। बीमार पिता अस्पताल में हैं और डॉक्टरों ने घोषित कर दिया है कि वे कभी भी मर सकते हैं। परिवार का हर सदस्य उनके मृत्यु की प्रतीक्षा में है। उनका केयर टेकर बेटा हमेशा झुंझलाया सा रहता है और बहस भी करता रहता है। अपने आस पास का माहौल देख अंतिम सांसें ले रहे वृद्ध अपने आप को बौना महसूस करने लगते हैं। जीवन के अंतिम पड़ाव पर आकर हमारे समाज की बुराइयाँ भी वृद्धों के परेशानी का सबब बनती हैं। कई बार अयाचित स्थितियाँ भी रास्ता रोक कर खड़ी हो जाती हैं। मोहन राकेश के ‘मलबे का मालिक’ कहानी की वृद्धा एक सवाल लेकर भटकती है कि वह विभाजन के दंगे में मृत अपने बेटे के जायदाद की वारिस बन सकती है कि नहीं? तरुण भटनागर की कहानी ‘फोटो का सच’ का तिहत्तर वर्षीय पिता अपने फौजी अफसर बेटे के मौत का मुआवजा लेने के लिए सरकारी दफ्तर के चक्कर लगाता है, क्लर्कों की चापलूसी करता है लेकिन उसके पास ऐसा कोई प्रमाणपत्र नहीं है जो सिद्ध कर सके कि वो उस लड़के का पिता है। ऐसी कई समस्याएं हमारे समाज में वृद्धों को लेकर मुखर हो रही हैं।
        यदि कहानियां लिखी जा रहीं हैं तो वो सामाजिक घटनाओं से कहीं न कहीं प्रेरित हैं और उनका उद्देश्य हमारे मनोरंजन के साथ सामजिक बुराइयों, कुरीतियों से हमें अवगत कर उनका निवारण करने का भी होता है। साहित्यकार अगर कुछ लिखता है तो उसके कुछ मायने होते हैं। वृद्ध समस्या हमारे देश के लिए एक शर्मनाक बात है जिसपर हमें सोचने और विचार करने की आवश्यकता है। वृद्धावस्था कोई अपराध तो नहीं! अपितु झुर्रियों से भरे चेहरे और हाथों में भी एक आकर्षक सौन्दर्य होता है और आशीर्वाद में उठा हाथ ही युवापीढ़ी के लिये पर्याप्त होता है। आज वृद्धावस्था और वृद्धाश्रम की समस्या के लिए संयुक्त परिवार का एकल परिवार में विघटन भी बहुत हद तक जिम्मेदार है। अफ़सोस तो इस बात का है कि आज दिन प्रतिदिन वृद्धाश्रमों की संख्या बढ़ती जा रही है और उनमें भी अधिकतर वे लोग हैं जिनकी संतान जीवित और कर्मरत है। बुजुर्ग अपने आप को अलग थलग महसूस कर रहे हैं। अतः आवश्यकता है संवेदनहीनता के इस दौर में बुजुर्गों की भावनाओं को समझने की, उनका साथ देने की, उनका सहारा बनने की ताकि बुजुर्ग अपनी बची खुची जिन्दगी चैन से जी सकें। डॉ सुरेश अवस्थी के शब्दों में-
              “अपने ख्वाहिश के परिंदों पे निशाना रखना
              वो जो जिंदगी का सफ़र है  उसको सुहाना रखना
              मन के मंदिर को सलीके से सजाकर रखना
              और उसमें बुजुर्गों का ठिकाना रखना।”
                                     
                                                  -सुस्मित सौरभ   
                   

शुक्रवार, 27 मार्च 2015



                      शोध आलेख
नेहरु और भारत की खोज
‘भारत की खोज’ (Discovery of India) हमारे भारतवर्ष के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरु द्वारा लिखी गई पुस्तकों में से एक प्रमुख ऐतिहासिक कृति है।  इस पुस्तक की रचना पंडित नेहरु द्वारा अहमदनगर जेल में अपने कारावास के दिनों को व्यतीत करने के क्रम में की गई।  मूलतः, अंग्रेजी भाषा में रचित इस पुस्तक के रचना की शुरुआत नेहरु जी ने स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में अप्रैल १९४४ में किया और पांच महीने की अवधि में सितम्बर १९४४ में इस  पुस्तक की रचना पूर्ण हुई।  हालाँकि कुछ लोग इसकी रचना की शुरुआत वर्ष १९४१ भी बताते है।  ‘भारत की खोज’ का प्रथम प्रकाशन वर्ष १९४६ में अंग्रेजी भाषा में हुआ तत्पश्चात यह पुस्तक हिन्दी और अन्य भाषाओं में अनुवादित हुई ।  आज यह पुस्तक भारत के कालजयी कृतियों में अपना  एक महत्पूर्ण स्थान रखती है।  
नेहरु जी ने भारत की खोज एक इतिहासकार के रूप न करके एक वैज्ञानिक, एक समाजशास्त्री, एक साहित्यकार के रूप में किया है।  ऐतिहासिक दृष्टि से इस पुस्तक के आँकड़े संगत भले ही प्रतीत नहीं होते परन्तु वैज्ञानिक, साहित्यिक, सामाजिक और अन्य दृष्टियों से यह पुस्तक हमारे मन मष्तिष्क पर एक अमिट छाप छोड़ने में सफल सिद्ध होती है।  जैसा कि पूर्व विदित है कि इस पुस्तक की रचना अहमदनगर जेल के उबाऊ और एकरसतापूर्ण परिवेश में की गई सो इसका प्रभाव नेहरु जी के वर्तमान और वैचारिक ऊहापोह के रूप में उनके पुस्तक के आरम्भ के एक बड़े हिस्से पर स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है साथ ही साथ इसका स्पष्ट प्रभाव इतिहास को लेकर उनके सोच पर झलकता है।  यहाँ भारत की खोज की रचना नेहरु जी के लिये इतिहास लेखन का या कोई शोधपरक कार्य नहीं है।  उन्होंने यहाँ अपने निजी जीवन, अपने वर्तमान जीवन की गुत्थियों को सुलझाने का प्रयास किया है।  नेहरु जी ने इतिहास लेखन की ओर अपना कदम तो बढ़ाया था परन्तु उनका यह लेखन वर्तमान और भविष्य के तलाश के साथ साथ मानवीय संबंधों की संश्लिष्टता को समझने के एक प्रयत्न था।  नेहरु जी का अतीत से साक्षात्कार का आलोचनात्मक नजरिया उन्हें वैज्ञानिक दृष्टिकोण प्रदान करता है।  नेहरु जी कोई इतिहासकार नहीं थे और न ही उन्होंने कभी ये दावा किया।  उनके अतीत की खोज में वैज्ञानिकता का आभास मिलता है।  भारत की खोज के बहाने उनका प्रयास देश और समाज के विशाल जन आवाम को अतीत की अच्छी और बुरी बातों से अवगत करने का था।  नेहरु जी के व्यक्तित्व के सामान ही उनके इतिहास का फलक असाधारण रूप से विशालकाय है।  भले ही आंकड़ों की दृष्टि से नेहरु जी का इतिहास ज्ञान ज्यादा समृद्ध न हो पर इस पुस्तक से उनके इतिहास ज्ञान की विविधता और नजरिये के समृद्धता का पता अवश्य चलता है।  
भारत की खोज, नेहरु जी द्वारा भारतवर्ष का मानवीकरण है जो अनेक रहस्यों, मान्यताओं, विश्वासों से लिप्त पड़ा है।  भारत के गौरवपूर्ण इतिहास में उन्हें भारत का विशाल जन आवाम दिखाई पड़ता है।  वे कभी वेदांत दर्शन से प्रभावित होते हैं तो कभी तो कभी बौद्ध धर्म और भारतीय दर्शन उन्हें अपनी ओर आकर्षित करते हैं।  वे व्यक्तिगत स्वतंत्रता के पक्षधर दिखाई पड़ते है।  इतिहास नेहरु जी के लिये किसी व्यक्ति विशेष का जमा हिसाब न होकर समूहों की दास्तान है।  इसीलिये नेहरु जी के भारत की खोज की  वर्णनात्मक न होकर आत्मकथात्मक हो गई है।  ।  वे पुराकालिक आदिमानव की बात करते हैं, उसके सभ्‍य होने की दास्‍तान कहते हैं, मिस्र, सुमेर, अक्‍कद और बेबीलोन की सभ्‍यता की बातें करते हैं, हडप्पा और आरंभिक चीन की संस्‍कृति, अजटेक, माया, इंका, ग्रीस, रोम, मध्‍य और आधुनिक योरप का उल्‍लेख करते हैं।  इसी के साथ, इंग्‍लैंड, फ्रांस और डच साम्राज्‍यवाद, अमरिका के स्‍वाधीनता आंदोलन और गृह युद्ध, एशिया एवं अरब के राष्‍ट्रवादी उत्थानों,महायुद्द, पूंजीवाद की समस्‍यायें, नाजीवाद, फासीवाद और अमरिका का एक विश्‍व शक्ति के रुप में उदय की बात भी कहते हैं। उनके इतिहास लेखन की शुरुआत सिंधु  सभ्यता से होती है जो अरबों, अफगानों, तुर्कों से होते हुए इस्लाम के आगमन से लेकर चंद्रगुप्त और अशोक तक जाती है।  भारत का वर्णन करने के क्रम में वे लिखते हैं कि यहाँ वेद, उपनिषद और वेदांत हैं, यहाँ एक समृद्ध सभ्यता है जहाँ दर्शन, कला, साहित्य, विज्ञान , गणित, अर्थशास्त्र विकसित हैं और दूसरे देशों से संपर्क भी है।  लेकिन फिर भी यह भारत कमजोरी का शिकार हो जाता है और भारत कि राजनैतिक दशा चरमरा जाती है।  सामाजिक संरचना में अलगाव और कठोरता का विकास होने लगता है, सामाजिक कुरीतियाँ जन्म लेने लगती हैं।  नेहरु जी ने ये माना है कि मुगलों के भारत में आगमन से यहाँ समृद्धि का प्रवेश होता है।  भले ही कई विद्वानों ने उनके कथन का पुरजोर विरोध किया लेकिन व्यावहारिक दृष्टि से नेहरु जी बिल्कुल सही थे।  हाँ, उन्होंने यह भी लिखा कि यह समृद्धि उस काल के शासक के व्यक्तित्व पर आश्रित थी और इसके संदर्भ में अकबर का संदर्भ भी दिया।  अठारहवीं शताब्दी में राजनैतिक कमजोरियों से भारत में अंग्रेजों के स्वागत का द्वार खुल गया और इस संदर्भ में उनका मत है कि हम करीब करीब भारत के प्रगति, विकास और पतन को माप सकते हैं।  जब भारत खुले मन से बाह्य विश्व का स्वागत कर रहा था तो वह विकसित था और जब उसने अपने आप को संकुचित कर लिया तो वह पतनोन्मुख हो गया। नेहरु के इस इतिहास लेखन की कुछ कमियों को कालांतर में उजागर किया गया जो निम्न है-
·             नेहरु जी के भारत की खोज उत्तर भारत तक ही सीमित रही और दक्षिण के चोल, चालुक्य, आंध्र आदि राजवंशों का परिचय मात्र मिलता है।
·             नेहरु जी ने मुस्लिम आक्रमणकारियों की आलोचना के स्थान पर उनके विकास के कार्यों कि सराहना की।  उनके इस कृति में अकबर की खूब प्रशंसा है परन्तु महाराणा प्रताप का जिक्र तक नहीं है।
·             उनके सबसे प्रसिद्ध बायोग्राफर एस। गोपाल ने नेहरु के भारत की खोज को अनेकों किताबों और अध-पके मार्क्‍सवादी विचारधारा का जल्‍दबाजी में लिखा किताब माना है और एक अन्‍य ने तो उन्‍हे रोमानी इतिहासकार कह कर खारिज कर दिया।  
·             कुछ राजनितिक दलों ने यह आरोप लगाया कि इस किताब में एक पैराग्राफ़ में शिवाजी पर आपत्तिजनक बातें लिखी गई हैं।

“भारत एक खोज” का पहला एपिसोड 1988 में प्रसारित किया गया था। यह धारावाहिक पंडित जवाहरलाल नेहरु की लिखी हुई एक प्रसिद्ध पुस्तक ‘भारत की खोज’ पर आधारित है, निर्माता थे – श्याम बेनेगल। पंडित नेहरू की इस कृति पर 52 कड़ियों का विशाल धारावाहिक बना चुके प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक श्याम बेनेगल ने इस बारे में कहा कि नेहरू का दृष्टिकोण पूरी तरह राष्ट्रीय था। यह बात उनकी प्रसिद्ध कृति से भी साबित होती है।  
बेनेगल ने कहा कि 'भारत एक खोज' नेहरू जी ने अहमदनगर जेल में लिखी थी।  उन्होंने कहा कि यह चूंकि आजादी से पहले लिखी गई थी लिहाजा, इसमें नेहरू के सामने वे सवाल थे जो भारत के समक्ष स्वतंत्रता के बाद आने वाले थे।  उन्होंने कहा कि राष्ट्र राज्य की धारणा पश्चिम से आई थी।  
पुस्तक के ‘तलाश’ शीर्षक में नेहरु जी लिखते हैं – “भारत मेरे खून में रचा बसा था।  इसके बावजूद मैंने उसे बाहरी आलोचक की नजर से देखना शुरू किया।  ऐसा आलोचक जिसने वर्तमान के साथ साथ अतीत के बहुत से अवशेषों को, जिन्हें उसने देखा था, नापसंद करता था।  एक हद तक मैं उस तक पश्चिम के रास्ते से होकर पहुँचा।
डिस्कवरी ऑफ इंडिया की चर्चा करते हुए वरिष्ठ नेता नटवर सिंह ने कहा कि निःसंदेह यह कृति उत्कृष्ट साहित्य का नमूना है।  हालांकि यह बात दीगर है कि कई लोग इसके इतिहास संबंधी कुछ अंशों से सहमत नहीं है।
हिंदी के वरिष्ठ साहित्यकार राजेंद्र यादव के अनुसार, जवाहरलाल नेहरू ने अपनी रचना डिस्कवरी ऑफ इंडिया में भारतीय इतिहास की रूपरेखा प्रस्तुत की थी।  उसे श्याम बेनेगल ने 'भारत की खोज' के जरिए वातावरण के माहौल में ढालने का प्रयास किया था।  यह सांस्कृतिक और साहित्यिक हिसाब से अच्छा प्रयास किया गया था।
वरिष्ठ फिल्म समीक्षक विनोद भारद्वाज के अनुसार, डिस्कवरी आफ इंडिया पर आधारित भारत की खोज अच्छा सीरियल था और श्याम बेनेगल की कृति 'वेल रिसर्च' पर आधारित थी।  बेनेगल का वह बढ़िया प्रयास था।
 उपरोक्त कथन नेहरु जी की भारत की खोज की कमियों के विरुद्ध उसकी उपलब्धियों का  भी संकेत करते है।
    इस प्रकार कहा जा सकता है कि नेहरु जी द्वारा रचित भारत की खोज एक खास मकसद से लिखी गयी किताब थी जिसमें भारत को एक राष्ट्र के रूप में परिभाषित करने का एक प्रसंशनीय प्रयास किया गया है।  नेहरु जी जब इस किताब की रचना कर रहे थे उस समय देश में काफी उथल पुथल की स्थिति थी, आजादी की जंग जारी थी सो उस समय देश को एक राष्ट्र के रूप में परिभाषित करना काफी आवश्यक था।  नेहरु जी एक राष्ट्र के तौर पर भारत को परिभाषित करना चाहते थे और इस कार्य के लिये उन्हें इतिहास में जाने की आवश्यकता महसूस हुई।  भारत का इतिहास पहले भी लिखा ज चुका था पर वह योरोपीय नजरिये से लिखा हुआ इतिहास था।  नेहरु जी एक ऐसे भारत के अतीत को देश के सामने प्रस्तुत करना चाहते थे जो योरोपीय रंग से मुक्त हो।  नेहरु के इस इतिहास के लेखन को भले ही रोमानी या लोकप्रिय कह कर ख़ारिज कर दिया जाये परन्तु नेहरु एक ऐसे नेता थे जो आम आदमी के समर्थक थे, जो भारतीय झंडे में चरखे की जगह अशोक चक्र स्थान देना चाहते थे।  अनेकता में एकता उनका मूल मंत्र रहा। भारत की खोज नेहरु जी के वैज्ञानिक, दार्शनिक दृष्टिकोण का परिचायक तो है ही साथ ही साथ आधुनिक सोच का प्रत्यक्ष प्रमाण भी है।

-    सुस्मित सौरभ
संदर्भ:-  
१.    भारत की खोज- पंडित जवाहर लाल नेहरु
२.    भारत की खोज विकिपीडिया
३.    जानकीपुल ब्लॉग
४.    अपनी हिन्दी ब्लॉग
५.    अमर उजाला ब्लॉग