आलेख
हिंदी कहानियों में वृद्ध समस्या
अपने
कर्तव्यों का निर्वहन करते करते मनुष्य जीवन की सांध्य बेला में कब पहुंच जाता है
उसे महसूस ही नहीं होता और जब तक उसे इसका एहसास होता है वह पाता है कि जीवन बंद
मुट्ठी में दबी रेत की तरह फिसल चुका है। बाल्यावस्था के पश्चात होश संभालते ही
मनुष्य अपने आप को अनेक जिम्मेदारियों से घिरा हुआ पाता है। इन जिम्मेदारियों का
एक एक कर सामना करने के पश्चात जब उसे लगता है कि कमोबेस उसकी सारी समस्याओं का
निवारण अब हो चुका है तब तक वह एक ऐसी अवस्था में पहुँच जाता है जो उसके जीवन की
सांध्य बेला या दूसरे शब्दों में वृद्धावस्था होती है। जीवन की इस अवस्था में
मनुष्य को आराम की आवश्यकता होती है, एक सहारे की जरुरत होती है। उम्र के इस मोड़
पर वह आसरे के लिए अपनी संतान की ओर बड़ी ही आशा भरी दृष्टि से देखता है जिस सन्तान
की हर जरूरत, हर सुख-दुःख का उसने जीवन भर ध्यान रखा। लेकिन प्रश्न उठता है कि
क्या अपनों का यह सहारा उस वृद्ध मनुष्य को मिलता है तो एकाध उत्तरों को छोड़
अधिकांशतः जवाब होते हैं – नहीं। जीवन भर हमें सुरक्षा और संरक्षण देने वाले हाथ जो
हमारी ऊँगली पकड़ कर हमें चलना सिखाते हैं, उसी का सहारा बनने का जब वक्त आता है तो
हम अपने हाथ पीछे क्यों खिंच लेते हैं? आखिर इस कहावत का सृजन क्यों होता है कि दो
माता पिता दस बच्चों को तो पाल सकते हैं लेकिन दस बच्चे दो माता पिता को नहीं पाल
सकते। उनके लिए वृद्धावस्था भत्ता और वृद्धाश्रम की आवश्यकता क्यों पड़ने लगती है?
जीवन की इस अवस्था में पहुँचकर घर के
बुजुर्ग अपने आप को अलग-थलग क्यों महसूस करने लगते हैं? मनुष्य के वृद्धावस्था का
करुण वर्णन शास्त्रों में भी मिलता है। भर्तृहरी ने वैराग्य शतक में वृद्धावस्था
का चित्रण करते हुए लिखा है – “शरीर पर झुर्रियाँ पड़ गयी हैं, चलने- फिरने का सामर्थ्य जा
चुका है। दांत टूट गए हैं, दृष्टि नष्ट हो गयी है। पुत्र शत्रुवत व्यवहार करते
हैं।” भारतीय धर्म,
दर्शन संन्यास और वानप्रस्थ के महत्त्व का महिमामंडन करते हैं तो सारी आचार संहिता
स्पष्ट होती है। जीवन भर कमाते- जोड़ते रहो, दूसरे के सुख –दुःख के भागी बनो
और जीवन के अंतिम समय में जब शरीर दुर्बल और निष्क्रिय हो जाये तो जंगल में धकेल
दिये जाओ। इस व्याख्या से तो दीर्घ जीवन अभिशाप सा प्रतीत होता है। आज के
परिपेक्ष्य में यदि कहा जाये तो स्वार्थपरायणता, भौतिकवादी जीवनशैली, मूल्य में
टूटन जैसे तत्वों के साथ साथ संयुक्त परिवार का एकल परिवार में क्षरण जो समाज में
अकेलेपन को जन्म देता है, भारतीय समाज में वृद्ध समस्या का एक प्रमुख कारण है और
इसके पीछे हमारा और आपका ही हाथ है।
हिंदी कहानियों के गौरवमयी इतिहास में समाज
की प्रमुख समस्याओं और ज्वलंत मुद्दों को सशक्त और सजग रूप से प्रस्तुत करने की एक
विस्तृत परंपरा मिलती है। बात यदि हिन्दी कहानियों में वृद्ध समस्या से जुड़े लेखन
की करें तो यह कोई नया विषय नहीं है। आरम्भ से ही हिन्दी लेखकों की लेखनी इस विषय
से जुड़ी कहानियों की रचना करती रही है फिर चाहे वो मुंशी प्रेमचन्द हों या भीष्म
साहनी या उषा प्रियंवदा हों या मनीषा कुलश्रेष्ठ। सभी ने अपनी कहानियों में वृद्ध
जीवन की भावनाओं, उनकी कठिनाइयों को कहीं न कहीं छुआ जरुर है। हिंदी कहानी में
वृद्धों की समस्याओं को अनेक परिप्रेक्ष्यों चित्रित किया गया है। समाज और परिवार
में वृद्ध जनों की अवमूल्यित स्थिति का निरूपण अनेक सन्दर्भों में देखने को मिलता
है। वृद्धों के जायदाद से जुड़ी समस्या को आलोकित करती मुंशी प्रेमचन्द की ‘बूढ़ी काकी’ एक मिसाल कायम करती है। इस कहानी की मुख्य समस्या की शुरुआत
होती है जब अमीर विधवा बुढ़िया बेटों की मृत्यु के बाद अपनी जायदाद अपने भतीजे
बुद्धिराम के नाम लिखती है। काकी की संपत्ति हथिया कर उसी के घर में पोते का तिलक
समारोह होता है, शहनाइयाँ बजती हैं, हलवाई तरह तरह के पकवान बनाते हैं और काकी
अपमानित की जाती है, घसीटी जाती है। क्षुधातुर, हतज्ञान बुढ़िया कूड़े से जूठन बीन
कर खाने को अभिशप्त है। उषा प्रियंवदा की कहानी ‘वापसी’ वृद्ध पुरुष के दर्द, टीस को अभिव्यक्त करती है। पैंतीस
साल तक स्वयं छोटे छोटे स्टेशनों पर रहकर, परिवार को शहर में रखकर उसके सुख सुविधा
का हर सामान जुटाने वाले गजाधर बाबू रिटायर्मेंट के बाद अपने पुत्रों, बेटी, बहू
यहाँ तक कि पत्नी की नजर में भी घर में पड़े एक फालतू सामान की तरह हो जाते हैं
जिसके लिए न तो घर में जगह है और न ही दिल में। गजाधर बाबू की स्थिति उस चारपाई की
तरह हो जाती ही जो कभी ड्राईंग रूम रहती है तो कभी रजाइयों के बीच तो कभी आचार के
मर्तबानों के बीच। कुछ यही स्थिति भीष्म साहनी की कहानी ‘चीफ की दावत’ के माँ की है।
उसे भी घर के फालतू सामान जैसा ही रखा जाता है और उसे किसी से बात करने की इजाजत
नहीं है। भीष्म साहनी की दूसरी कहानी ‘यादें’ वृद्धों की उपेक्षा और वृद्धावस्था में उनकी दोस्ती की कथा
का वर्णन है। वृद्धों की पारिवरिक और सामाजिक स्थिति को उजागर करती है चन्द्रकिशोर
जायसवाल की कहानी ‘मानबोध बाबू’। एक यात्रा के दौरान दो वृद्धों की बातचीत कहीं न कहीं उनके सामाजिक और
पारिवारिक जीवन में घुले दर्द को दिखाती है और बताती है कि लोगों को वृद्ध नहीं
बल्कि उनकी जायदाद प्रिय होती है। रिटायर्मेंट के बाद वृद्ध यदि गाँव में रहे तो
उनकी मूलभूत आवश्यकताएं पूरी नहीं होती और यदि अपनी सारी जायदाद बेचकर सन्तान के
पास महानगरों में जाएँ तो सारी कमाई सन्तान के हाथ में देनी पड़ती है। यदि वे ऐसा
नहीं करते तो फिर उनका शेष जीवन नारकीय हो जाता है। नव कथाकार उपासना की कहानी ‘कार्तिक का पहला
फूल’ में एक वृद्ध ने
एकाकीपन को दूर करने के लिए अपने आप को बागवानी में व्यस्त कर रखा है और उसके
द्वारा लगाये गये गुड़हल के पौधे के पहले फूल की प्रतीक्षा करता रहता है। जिस दिन
उसके बगिये का पहला फूल खिलता है वृद्ध पुलकित हो उठता है लेकिन कुछ पल पश्चात यह
फूल उसकी बहू द्वारा तोड़ लिया जाता है। फूल का टूटना वृद्ध के मानसिक व्यथा का
कारण बन जाता है। सूर्यबाला की ‘सांझवती’ कहानी वृद्धों में उनके नकारेपन के एहसास की कहानी है।
अस्सी वर्ष का वृद्ध अपनी बहत्तर वर्षीय पत्नी से मिलने के लिए सात कोस पैदल चलता
है। हालाँकि उसके बेटे के पास कार है, ड्राइवर भी है लेकिन वो सब बेटे के अपने
बीबी बच्चों के लिए है न की माता पिता के लिए। जाहिर सी बात है कि परिवारों में
वृद्ध त्रासद जीवन जीने को मजबूर हैं। उनमें जीवन को लेकर उदासीनता है और वे
आत्महत्या तक के लिए प्रयासरत दिखाई पड़ते हैं।
वृद्ध लाचार होते हैं और इस अवस्था में
उन्हें एक सहारे की आवश्यकता होती है लेकिन इसका मतलब ये तो नहीं कि वे बोझ हैं।
बुजुर्ग वृक्ष भले ही फल न दे पर उसकी छाया तो हमारे ऊपर सदा ही बनी रहती है। वे
घर परिवार को जोड़कर रखने में सहायक होते हैं। वे घर के बच्चों को शिष्टाचार,
पारिवारिक इतिहास, धार्मिक एवं सांस्कृतिक मूल्यों से परिचित कराते हैं और उनके
मानसिक विकास में सहायक होते हैं। मनीषा कुलश्रेष्ठ की ‘प्रेतकामना’ मुंबई के सी बीच
पर बने तीन कमरों के फ़्लैट में अकेला जीवन गुजारते के विधुर की कहानी है जो कभी जे
एन यू में एन्थ्रोपोलोजी के विभागाध्यक्ष थे। आज उनका बेटा इसी शहर में अलग रहता
है, बेटी कलकत्ता में है और पत्नी की मृत्यु हो चुकी है। उनके समक्ष न तो समाज है,
न परिवार और न ही पद- प्रतिष्ठा। कुछ है तो सिर्फ अकेलापन, एकाकीपन। आज हमारे
बुजुर्गों के सामने एक बड़ी समस्या है उनके अकेलेपन की। आज की व्यस्त दुनिया में
किसी के पास उनके लिए समय नहीं है। बुजुर्गों का कोई हमदर्द हो सकता है तो वो दूसरा
बुजुर्ग ही हो सकता है ऐसी हमारी मान्यता बन चुकी है। आज यह आलम है की सम्बन्धगत
अकेलापन वृद्धों-बुजुर्गों को गोद गोद कर खा रहा है और समाज में बुजुर्गों के साथ
बढ़ते अपराध उनके लिए भय और चिंता का कारण बन रहे हैं। राजी सेठ की कहानी ‘इन दिनों’ वृद्धावस्था के इसी
दर्द को आवाज देती है। यह कहानी रोजी-रोटी की तलाश में परदेश जा चुके बेटे –बेटियों के पीछे
अकेले पड़ गये बूढ़े माता पिता की कहानी है जिनके जीवन में शून्यता और संत्रास ने घर
कर लिया है। पिता को दैनिक अख़बार पढ़कर यह लगता है कि मृत्यु से पहले वे कहीं चोर
डाकुओं के शिकार न बन जायें। घर में नौकर की उपस्थिति और उनके पत्नी की बेफिक्री
उन्हें सदा ही चिंतित किये रहती है। उन्हें लगता है की बेटों के साथ उनके संरक्षण
में पति-पत्नी की जिन्दगी ज्यादा सुरक्षित है। राजी सेठ की दूसरी कहानी ‘मार्था का देश’ विदेश चले गये
बेटे और उसके पत्रों का इन्तजार करती माँ का दर्द बयां करती है। माँ इतनी उपेक्षित
हो जाती है कि बेटे के विदेश से वापस लौट आने के बाद उसके जाने का इंतजार करने
लगती है। आज के परिपेक्ष्य में कहानीकारों ने बुजुर्गों के अकेलेपन की समस्या को
कहीं न कहीं परिवार के सदस्यों के विदेश गमन से जोड़ने की कोशिश की है। वृद्ध
समस्या को केंद्र बनाकर कहानी लेखन के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण नाम सुषम बेदी का
आता है। उनकी कहानी ‘झाड़’ में अमेरिका में
जन्मे सात वर्षीय समीर को भारतीय संस्कृति से अवगत कराने के लिए, घरेलू शिष्टाचार
और स्नेह ममत्व से सराबोर करने के लिये उसकी नानी मालती को अमेरिका बुलाया जाता
है। लेकिन यह क्या? बच्चे को नानी में कोई दिलचस्पी नहीं है। उसके पास खेलने के
लिए गेम्स, खाने के लिए फ़ास्ट फ़ूड और साथ देने के लिए बेबी सिटर है। समीर के जीवन
में नानी शब्द की कोई अहमियत नहीं दिखती। उसे न तो नानी का बनाया खाना पसंद आता न
ही उसके कपडे और न ही उसका स्नेहमयी बर्ताव बल्कि नानी तो समीर के लिए किसी एलियन
की तरह है। सुषम बेदी की दूसरी कहानी ‘नाते’ में बेटा राज १७ वर्षों पहले अमेरिका में बस चुका है और
उसने अपने भाइयों को भी वहां बुला लिया है। राज जब भी अपनी पत्नी के साथ भारत आता
है तो उसके नाते रिश्तेदार उससे माँ बाप को अमेरिका ले जाने की बात कहते है। राज
अपने माँ बाप को अमेरिका ले भी जाता है परन्तु पिता अपने अड़ियल स्वभाव के कारण
वहां एडजस्ट नहीं कर पाते और वापस भारत लौट आते हैं। डॉ सूर्यबाला की कहानी ‘आखिरी विदा’ प्रवासी बेटे के
अकेले माँ-बाप की कहानी है। यह सोचकर कि बेटा सात वर्षों के पश्चात भारत आ रहा है
वे ख़ुशी से भर उठते हैं और बेटे के स्वागत की तैयारी में लग जाते हैं। लेकिन बूढ़े
माँ-बाप एक टीस से तब भर जाते हैं जब उन्हें महसूस होता है कि बेटा अब उनसे संकोच
करता है, औपचारिकता पूर्ण व्यवहार करता है। कुछ असहज सी बातचीत के बाद बेटा कुछ
दिन पश्चात माँ-बाप की आँखों में एक अंतहीन इंतज़ार छोड़कर वापस विदेश चला जाता है।
बूढ़े माँ-बाप के अकेलेपन के दर्द को इस कहानी में एक भावपूर्ण अभिव्यक्ति मिलती
है। तेजेंद्र शर्मा की कहानी ‘पासपोर्ट के रंग’ प्रवासी भारतीय बुजुर्गों के मानसिक स्थिति की पड़ताल करती
है। यह कहानी एक ऐसे व्यक्ति की कहानी है जो अपने देश से प्रेम करता है और सारी
सुख सुविधाओं के बीच भी भारतीय नागरिकता न होने के कारण बेचैनी का अनुभव करता है।
इस प्रकार उपर्युक्त कहानियों के संदर्भण से यह अभिलक्षित होता है कि प्रवासी या
परदेश में रहने वाले लोगों के माँ-बाप की स्थिति घर के पहरेदार की हो जाती है जो
बहन-भाई की शादियों, पति या पत्नी की मृत्यु के बाद एक बड़े घर में अकेले रह जाते
हैं, वह घर जिसे उन्होंने अपनी मेहनत की कमाई की पाई-पाई जोड़कर बनाया था और जिसमें
सपरिवार रहने का उनका पुराना सपना था। प्रतिभा पलायन का यह दौर यदि नहीं रुका तो
मुझे लगता है कि कुछ दशकों के बाद भारत में घरों में हमारे बुजुर्ग चौकीदार की
भूमिका में एकाकी जीवन व्यतीत करते नजर आयेंगे।
समय तेजी से बदल रहा है और हम पाश्चात्य
संस्कृति की ओर उन्मुख हो रहे है या कुछ
हद तक उसे अपने जीवन में उतार भी लिया है। लेकिन एक बात समझ में नहीं आती कि हम तो
अपने जीवन में आधुनिक रहन सहन को प्रश्रय दे रहे हैं और अपने बुजुर्गों को हमने एक
विशेष जीवन शैली के बंधन में बांध दिया है। दूसरे शब्दों में कहा जाये तो हमने
उनके लिए एक ‘कोड ऑफ़ कंडक्ट’ बना डाला है। वृद्ध तीर्थाटन करें, भजन-कीर्तन करें, पत्र- पत्रिकायें पढ़ें,
सुबह- शाम सैर को जायें, बागवानी करें तो ठीक लेकिन वृद्ध डिस्को जाते हैं,
वेस्टर्न कपड़े और संगीत का शौक रखते हैं, विषमलिंगी मैत्री रखते हैं, पुनर्विवाह
करते हैं तो वह गलत है। ऐसा क्यों? क्या वृद्ध होते ही मनुष्य देश के सामान्य
नागरिक का अधिकार खो देता है? साहित्य समाज में घटित होने वाली सभी बातों को अपने
अन्दर समाहित कर लेता है। आधुनिक कथाकारों ने उरोक्त वर्णित बिंदु को ध्यान में
रखकर भी सहृदयता से लिखा है। अमरीक सिंह दीप की कहानी ‘तीर्थाटन’ की चौवन वर्षीय
विधवा सुदेश जो बेटे-बेटी और नाती- नातिनों वाली है पर पुरुष के साथ तीर्थाटन पर
चली जाती है। उसका यह कृत्य उसे उसके बेटों की नजर में कुल्टा, कुलच्छिनी, बेहया
बना देता है और पूरा घर मारो, फूंको, काटो जैसे शब्दों से गूँज उठता है। इसका मतलब
यही निकलता है कि विधवा को अपने ढंग से जीने का कोई हक़ नहीं क्योंकि उसके बेटे और
बेटियों को ऐसी माँ चाहिए जो बीमार, झुर्रीदार चेहरे वाली हो, जो सफ़ेद, मैली,
पैबंद वाली साड़ियाँ पहने, मंदिर में प्रवचन सुने, व्रत उपवास रखे। यदि यह विधवा
ग़ज़ल सुने, मॉर्निग वाक पर जाये, रोमांटिक पत्रिकायें पढ़े तो यह बात उसके बेटे-
बहुओं को नहीं पचती। कृष्णा अग्निहोत्री की कहानी ‘यह क्या जगह है दोस्तों’संगीतकार ऋतु की कहानी है। पति की मृत्यु के बाद बच्चे उसके
फिल्म देखने, संगीत सुनने, रियाज करने, रेडियो प्रोग्राम देने यहाँ तक कि किसी से
फोन पर बात करने और किसी शादी- पार्टी में जाने पर भी रोक लगा देते हैं। उसे अपने
वाद्ययंत्र बेचकर कम्प्यूटर खरीदने की सलाह दी जाती है। कुछ वृद्ध-बुजुर्ग भी
आधुनिक जीवन शैली को अपना नहीं पाते इसके पीछे चाहे उनका पारम्परिक जीवन मूल्य हो
या अतीत का दर्द। कुछ इसी भाव को बयां करती है सुषम बेदी की कहानी ‘गुनाहगार’। यह कहानी एक साठ
वर्ष की विधवा की कहानी है जो पुनर्विवाह नहीं करना चाहती। लेकिन उसके बेटी-दामाद
उसे विकसित संस्कृति का हवाला देकर दूसरी शादी का विज्ञापन दे देते हैं। लेकिन वह
अपने पति की छवि विज्ञापन वाले व्यक्ति में नहीं देख पाती। अपने परम्परागत भारतीय
संस्कारों से लड़ती हुई उसकी आत्मा इस अंतर्द्वंद्व में पराजित हो जाती है और वह
विज्ञापन वाले अख़बार को अपने हाथों से फाड़ देती है। मनीषा कुलश्रेष्ठ की कहानी ‘प्रेतकामना’ के विधुर डॉ पन्त
के प्रेत से जीवन की कामनाएं तब लहरती हैं जब वे अपनी अमेरिका से लौटी पुराणी
छात्रा को देखते हैं। उन दोनों में शारीरिक सम्बन्ध भी कायम होते हैं। अपने पिता की इस
नई दुनिया को देखकर बेटे के की साडी श्रद्धा, प्यार और मोह निथर जाते हैं।मुशर्रफ
आलम जौकी की कहानी ‘बाप और बेटा’ पिता के कुंठित मनोदशा का मनोविश्लेषण है। शादी के बाद पति और पिता बनते ही
पुरुष मर्यादा की सीमा में बांध दिए जाते हैं। वृद्धावस्था तो एक ऐसी अवस्था है
जिसमें दोस्तों की भी आवश्यकता अधिक होती है
लेकिन घर के लोग उन दोस्तों को बर्दास्त नहीं करते। अब तो लोग बुजुर्ग पति
पत्नी को भी बाँट कर रखना चाहते हैं। विदेशों में लोग ८० वर्ष की उम्र में भी शादी
करते हैं लेकिन भारत में यदि कोई वृद्ध अपने पसंद का एक पल भी जी ले तो लगता है
जैसे आफत सी आ जाती है।
उपरोक्त समस्याओं के साथ साथ हमारे भारत
में वृद्धों से जुड़ी कई अन्य समस्याएं भी
देखने को मिलती हैं। उन्हें प्रताड़ित किया जाता है, कमरे में कैद कर भूखा रखा जाता
है, उनसे मार पीट और जोर जबरदस्ती की जाती है यहाँ तक की उनसे भीख भी मंगवायी
जाती है। बीमारी और बुढ़ापा एक दूसरे के
पूरक होते हैं। लगभग हर कहानी वृद्धों के मृत्यु का इंतजार कर रही संतानों को लेकर
केन्द्रित दिखाई पड़ती है। इसी भाव को व्यक्त करती है निर्मल वर्मा की कहानी ‘बीच बहस में’। बीमार पिता
अस्पताल में हैं और डॉक्टरों ने घोषित कर दिया है कि वे कभी भी मर सकते हैं।
परिवार का हर सदस्य उनके मृत्यु की प्रतीक्षा में है। उनका केयर टेकर बेटा हमेशा
झुंझलाया सा रहता है और बहस भी करता रहता है। अपने आस पास का माहौल देख अंतिम
सांसें ले रहे वृद्ध अपने आप को बौना महसूस करने लगते हैं। जीवन के अंतिम पड़ाव पर
आकर हमारे समाज की बुराइयाँ भी वृद्धों के परेशानी का सबब बनती हैं। कई बार अयाचित
स्थितियाँ भी रास्ता रोक कर खड़ी हो जाती हैं। मोहन राकेश के ‘मलबे का मालिक’ कहानी की वृद्धा
एक सवाल लेकर भटकती है कि वह विभाजन के दंगे में मृत अपने बेटे के जायदाद की वारिस
बन सकती है कि नहीं? तरुण भटनागर की कहानी ‘फोटो का सच’ का तिहत्तर वर्षीय पिता अपने फौजी अफसर बेटे के मौत का
मुआवजा लेने के लिए सरकारी दफ्तर के चक्कर लगाता है, क्लर्कों की चापलूसी करता है
लेकिन उसके पास ऐसा कोई प्रमाणपत्र नहीं है जो सिद्ध कर सके कि वो उस लड़के का पिता
है। ऐसी कई समस्याएं हमारे समाज में वृद्धों को लेकर मुखर हो रही हैं।
यदि कहानियां लिखी जा रहीं हैं तो वो
सामाजिक घटनाओं से कहीं न कहीं प्रेरित हैं और उनका उद्देश्य हमारे मनोरंजन के साथ
सामजिक बुराइयों, कुरीतियों से हमें अवगत कर उनका निवारण करने का भी होता है।
साहित्यकार अगर कुछ लिखता है तो उसके कुछ मायने होते हैं। वृद्ध समस्या हमारे देश
के लिए एक शर्मनाक बात है जिसपर हमें सोचने और विचार करने की आवश्यकता है।
वृद्धावस्था कोई अपराध तो नहीं! अपितु झुर्रियों से भरे चेहरे और हाथों में भी एक
आकर्षक सौन्दर्य होता है और आशीर्वाद में उठा हाथ ही युवापीढ़ी के लिये पर्याप्त
होता है। आज वृद्धावस्था और वृद्धाश्रम की समस्या के लिए संयुक्त परिवार का एकल
परिवार में विघटन भी बहुत हद तक जिम्मेदार है। अफ़सोस तो इस बात का है कि आज दिन
प्रतिदिन वृद्धाश्रमों की संख्या बढ़ती जा रही है और उनमें भी अधिकतर वे लोग हैं
जिनकी संतान जीवित और कर्मरत है। बुजुर्ग अपने आप को अलग थलग महसूस कर रहे हैं।
अतः आवश्यकता है संवेदनहीनता के इस दौर में बुजुर्गों की भावनाओं को समझने की,
उनका साथ देने की, उनका सहारा बनने की ताकि बुजुर्ग अपनी बची खुची जिन्दगी चैन से
जी सकें। डॉ सुरेश अवस्थी के शब्दों में-
“अपने ख्वाहिश के परिंदों पे निशाना रखना
वो जो जिंदगी का सफ़र है उसको सुहाना रखना
मन के मंदिर को सलीके से सजाकर रखना
और उसमें बुजुर्गों का ठिकाना रखना।”
-सुस्मित
सौरभ
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