रविवार, 5 जुलाई 2015

हिन्दी जगत : विस्तार और संभावनाएं
     भारतभूमि के गौरवशाली अतीत में हिन्दी भाषा के अभिव्यक्ति में प्रयोग की एक सुदीर्घ और विस्तृत परंपरा मिलती है। साहित्यकारों और इतिहासकारों के मतानुसार हिन्दी भाषा का उद्गम १०वीं शताब्दी के आसपास माना गया है और तब से लेकर आजतक हिन्दी भाषा पूरे भारत में बोली और समझी जाती रही है। हिंदी भाषा की बढ़ती जा रही लोकप्रियता का अंदाजा इसी से ही लगाया जा सकता है कि सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में हिंदी सीखने वालों की संख्या में जबरदस्त बढ़ोत्तरी हुई है। पिछले १०-१२ वर्षों में हिंदी बोलने वालों की संख्या में कई गुना वृद्धि दर्ज की गई है।  देश में विदेशियों के आधिपत्य एवं गुलामी के दिनों में यहाँ अँग्रेज़ी शासनकाल होने की वजह से, अँग्रेज़ी का प्रचलन बढ़ गया था। लेकिन स्वतंत्रता के पश्चात देश के कई हिस्सों को एकजुट करने के लिए एक ऐसी भाषा की ज़रूरत थी जो सर्वाधिक बोली जाती है, जिसे सीखना और समझना दोनों ही आसान हों तब विकल्प के रूप में हमारे समक्ष एक ही भाषा थी जो अपने लक्ष्य में सफल सिद्ध हो सकती थी वो थी हिन्दी। आज भारत का लगभग पूरा जनआवाम हिन्दी भाषा को समझ या बोल सकता है। लेकिन यह बड़े दुःख की बात है कि इस गौरवमयी भाषा को अब तक राष्ट्रभाषा का दर्जा नहीं मिल सका और यह आज भी राजभाषा और संपर्कभाषा ही बनी हुई है। विश्व में प्रत्येक सम्मुन्नत, स्वतंत्र और स्वाभिमानी राष्ट्र की अपनी एक राष्ट्रभाषा है। इंगलैंड, अमेरिका, रूस, जर्मनी, चीन, फ़्रांस जैसे सभी देशों में वहाँ की एक व्यापक प्रचलित भाषा राष्ट्रभाषा के रूप में व्यवहृत होती है। पर अफ़सोस कि हमारे देश भारत में आज भी कोई राष्ट्रभाषा नहीं है। इसका कारण चाहे हमारी सैकड़ों वर्षों की दासता हो या क्षेत्रीय राजनीति या कुछ और, लेकिन यह सर्वविदित है कि हमारी हिन्दी विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र की सबसे लोकप्रिय भाषा बनी हुई है और इसमें कोई संदेह नहीं कि हिन्दी के क्षेत्र में काफी विकास और विस्तार हुआ है। हिन्दी के प्रयोग को बढ़ाने के लिये कई महत्वपूर्ण और रचनात्मक कदम उठाये गये हैं और हमें काफी हद तक सफलता भी मिली है। भूमंडलीकरण के इस दौर में हिन्दी कई क्षेत्रों में अपने पैर जमाती नजर आती है।
हिन्दी जगत: विस्तार
हिन्दी जगत के विस्तार की चर्चा को मैंने निम्न बिंदुओं के अंतर्गत विभाजित करने का प्रयास किया है-
(क)         शिक्षा के क्षेत्र में
(ख)         साहित्य के क्षेत्र में
(ग)     मीडिया और जनसंचार के क्षेत्र में
(घ)     फ़िल्म और टेलीविजन के क्षेत्र में
(ङ)      समाज, व्यापार और राजनीति के क्षेत्र में  
(च)     सूचना तकनीक और कम्प्यूटर के क्षेत्र में    

उपर्युक्त बिंदुओं के अंतर्गत हिन्दी जगत के क्षेत्र विस्तार को निम्न रूप में अभिव्यक्त किया जा सकता है –
(क)        शिक्षा के क्षेत्र में :      सन १८३५ में लॉर्ड मैकाले ने हिन्दी भाषा को साहित्यिक और वैज्ञानिक जानकारी की दृष्टि से अक्षम घोषित कर अंग्रेजी को मानक भाषा का दर्जा दिया था। इसके पश्चात अंग्रेजी की हिमाकत डलहौजी और  कर्जन से लेकर पंडित नेहरु तक करते नजर आये। अंग्रेजीवादियों की दृष्टि में आज भी बिना अंग्रेजी के भारतीय भाषाओं का विकास संभव नहीं है। परन्तु, शिक्षा के क्षेत्र में हिन्दी के विस्तारीकरण ने उपरोक्त मिथ को चूर-चूर कर दिया है।  जहाँ कभी रक्षासेवा, लोकसेवा, आई आई टी, बैंक आदि की परीक्षाओं के लिये अंग्रेजी माध्यम अनिवार्य माना जाता था वहीं आज ये सारी परीक्षाएं हिन्दी में हो रही हैं और यही नहीं इन परीक्षाओं में हिन्दी माध्यम के उम्मीदवार शीर्षस्थ स्थान प्राप्त कर रहे हैं। हिन्दी की महत्ता इस बात से सिद्ध होती है कि देश के छोटे से लेकर बड़े विश्वविद्यालयों तक लगभग हर जगह हिन्दी विषय का अध्ययन-अध्यापन हो रहा है और वहाँ शोधकार्य भी सफलता से संपन्न हो रहे हैं चाहे वो असम का तेजपुर विश्वविद्यालय हो या फिर दक्षिण भारत का मदुरै कामराज विश्वविद्यालय। आज हमारे देश में विदेशों से भी छात्र आकार हिन्दी विषय का अध्ययन कर रहे है, शोध कर रहे हैं। हिन्दी न केवल एशिया, यूरोप के देशों और अमरीका में बल्कि इज़राइल के विश्वविद्यालयों में भी पढ़ायी जा रही  है। रूसी विश्वविद्यालयों में भी हिन्दी के विशेषज्ञ शिक्षा पा रहे हैं। अमेरिका के ७५ (पचहत्तर) विश्वविद्यालयों में हिन्दी-शिक्षण की पर्याप्त व्यवस्था है। मॉरीशस में हिंदी का काफी प्रचार, प्रसार है, पाठशाला, विद्यालय तथा प्रशिक्षण कॉलेज हैं। यह सत्य है कि हिंदी में अंग्रेजी के स्तर की विज्ञान और प्रौद्योगिकी पर आधारित पुस्तकें नहीं हैं पर विगत कुछ वर्षों से इस दिशा में उचित प्रयास हो रहे हैं। अभी हाल ही में महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा द्वारा हिंदी माध्यम में एम.बी.ए. का पाठ्यक्रम आरंभ किया गया है जो  काफी लोकप्रिय हो रहा है। यह हिन्दी के क्षेत्र में एक बड़ी उपलब्धि है। आज हिन्दी देश के लगभग सभी विद्यालयों में एक अनिवार्य भाषा के रूप में पढ़ाई जा रही है और छात्रों का नामांकन भी बड़े पैमाने पर हो रहा है।
(ख)        साहित्य के क्षेत्र में :    किसी भाषा की महत्ता को निरुपित करने के लिये यह आवश्यक होता है कि उसमें साहित्य सृजन की एक विस्तृत और दीर्घ परंपरा हो और प्रायः सभी विधाएं वैविध्यपूर्ण और समृद्ध हों साथ ही साथ  इसमें दूसरे भाषा के साहित्य से विचार विनिमय करने का सामर्थ्य हो। हिन्दी भाषा उपर्युक्त सारे गुणों से परिपूर्ण है। हिन्दी भाषा और साहित्य में पद्य और गद्य रचना का एक पुराना इतिहास मिलता है। हिन्दी एक मात्र ऐसी भारतीय भाषा है जिसमें उस क्षेत्र के बाहर के साहित्यकारों ने भारी मात्रा में साहित्य रचना की है। इन साहित्यकारों में प्रमुख हैं – मोटुरि सत्यनारायण, गजानन मुक्तिबोध, यशपाल, उपेन्द्रनाथ अश्क, मन्मथनाथ गुप्त, क्षितिमोहन सेन आदि। यही नहीं, भारत के विभिन्न भाषाओं के साहित्य का अनुवाद भी हिन्दी भाषा में हुआ है और हो रहा है। आज के समय में विदेशी भाषा के प्रमुख सभी साहित्यकारों के साहित्य का हिन्दी अनुवाद या हिन्दी संस्करण सुगमता से उपलब्ध है। इसका कारण है कि हमारे भारत देश के साथ-साथ विदेशों में भी हिन्दी भाषा का एक विशाल पाठक वर्ग तैयार हो चुका है जो हिन्दी साहित्य में रूचि रखता है। आज चाहे चेतन भगत हों या अमीश त्रिपाठी या कोई अन्य जो अंग्रेजी में लेखन कर रहे हैं, उनकी कृतियों का हिन्दी संस्करण उपलब्ध है क्योंकि एक ऐसा पाठक वर्ग है जो हिन्दी पढ़ता है और यह सिद्ध होता है कि हिन्दी का क्षेत्र दिनों दिन बढ़ रहा है। हिन्दी में रचना करने वाले रचनाकारों की संख्या में काफी वृद्धि हुई है और साथ ही साथ हिन्दी प्रकाशकों की संख्या में भी। यही नहीं हिन्दी के काफी शोधपत्रों का प्रकाशन भी जोर-शोर से हो रहा है। मुझे लगता है कि आरम्भ से हिन्दी साहित्य के पिछड़ेपन का एक प्रमुख कारण साहित्यकारों की गरीबी और साहित्य मुद्रण में होने वाला अत्यधिक खर्च रहा है। परन्तु आज स्थिति बदल गयी है। प्रिंट मीडिया की जगह इलेक्ट्रोनिक मीडिया ने ली है और आज साहित्य का प्रकाशन इ-बुक और इ-मैग्जीन के रूप में हो रहा है जिससे साहित्य रचना का लाभ साहित्यकारों से लेकर पाठकों को आसानी से मिल पा रहा है। भारत के बाहर विदेशों में भी हिन्दी साहित्य रचना का कार्य बड़े पैमाने पर हो रहा है।  संयुक्त राज्य अमेरिका में ही दो सौ से अधिक हिंदी साहित्यकार सक्रिय हैं जिनकी पुस्तकें छप चुकी हैं। अमेरिका से ‘विश्वा', ‘हिंदी जगत’, ‘प्रयास’, ‘साहित्यकुंज’  तथा वैज्ञानिक पत्रिका ‘विज्ञान प्रकाश’ हिंदी की दीपशिखा को जलाए हुए हैं तो मॉरीशस से ‘विश्व हिंदी समाचार’, ‘सौरभ’, ‘वसंत’ जैसी पत्रिकाएँ हिंदी के सार्वभौम विस्तार को प्रामाणिकता प्रदान कर रही हैं। संयुक्त अरब इमारात से वेब पर प्रकाशित होने वाले हिंदी पत्रिकाएँ ‘अभिव्यक्ति’ और ‘अनुभूति’ पिछले कई वर्षों से लोकमानस को तृप्त कर रही हैं। फिज़ी सरकार सूचना-मंत्रालय के माध्यम सेनवज्योतिनामक त्रैमासिक हिंदी-पत्रिका का भी प्रकाशन करती है, जिसका विषय सरकारी कार्यों और उपलब्धियों पर आधारित होता है। आस्ट्रेलिया में न्यू साउथ वेल्स से मासिक पत्रिका हिंदी समाचार पत्रिका’, ब्रिटेन से प्रकाशित त्रैमासिक हिंदी-पत्रिकाप्रवासिनी’, ‘पुरवाई’, बर्मा से मासिक पत्रिका ब्रह्मभूमि’, गुयाना से मासिक पत्रिका ज्ञानदा’, सूरीनाम से आर्यदिवाकरऔर मासिक पत्रिका ‘सरस्वती’ आदि का प्रकाशन हिंदी के विश्वव्यापी विस्तार का ठोस प्रमाण प्रस्तुत करते हैं।
(ग)        मीडिया और जनसंचार के क्षेत्र में  :          यदि बात जनसंचार के माध्यमों में भागीदारी की करें तो हिन्दी का स्थान भारत में ही नहीं विश्व में भी सर्वोपरि है। फिर बात समाचार पत्र की हो या रेडियो की, या उपग्रह चैनल, सोशल साइट्स और ब्लॉग की। आज विश्व में सबसे ज्यादा पढ़े जानेवाले समाचार पत्रों में आधे से अधिक हिन्दी के हैं। यदि भारत की बात की जाये तो यहाँ सर्वाधिक समाचार पत्र हिन्दी भाषा में ही प्रकाशित होते हैं। इसका आशय यही है कि पढ़ा-लिखा वर्ग भी हिन्दी के महत्त्व को समझ रहा है। वस्तुस्थिति यह है कि आज भारतीय उपमहाद्वीप में ही नहीं बल्कि दक्षिण पूर्व एशिया, मॉरीशस, चीन, जापान, कोरिया, मध्य एशियाअफ्रीका, यूरोप, कनाडा तथा अमेरिका तक में हिन्दी कार्यक्रम उपग्रह चैनलों के जरिए प्रसारित हो रहे हैं और भारी तादाद में उन्हें दर्शक भी मिल रहे हैं। आज मॉरीशस में हिंदी सात चैनलों के माध्यम से धूम मचाए हुए है। विगत दो दशकों  में एफ.एम. रेडियो के विकास से हिंदी कार्यक्रमों का नया श्रोता वर्ग पैदा हो गया है। बी बी सी लन्दन, रेडियो रूस, रेडियो डॉयचेवेले जैसे कई महत्वपूर्ण रेडियो चैनल हैं जो कई दशकों से हिन्दी में कार्यक्रम प्रस्तुत करते आ रहे हैं जिससे हिन्दी के विस्तार को काफी बढ़ावा मिला है। फिज़ी में रेडियो नवरंगऐसा रेडियो स्टेशन है, जो २४ घण्टे हिंदी कार्यक्रम पेश कर रहा है। भारत में टेलीविजन के समाचार के चैनल की बात की जाए तो अधिकतर चैनल हिन्दी भाषा में ही समाचार प्रस्तुत करते हैं और दिन प्रतिदिन इनकी संख्या में वृद्धि हो रही है। इंटरनेट पर हिन्दी के अनेक पोर्टल हैं। फेसबुक, व्हाट्स अप्प, ट्विटर, ब्लॉग आदि पर हिन्दी भाषा देवनागरी लिपि में भी लिखी जाने लगी है जो कुछ वर्ष पूर्व रोमन में लिखी जाती रही थी। इंटरनेट पर हिन्दी ब्लॉग की बाढ़ सी आ रखी है। देश ही नहीं विदेशों से भी ब्लॉग लेखन का काम हिन्दी में हो रहा है और साथ ही साथ लोग विदेशों में इन्हें बड़ी सजगता से पढ़ भी रहें हैं। इस प्रकार इंटरनेट जैसे वैश्विक माध्यम पर हिन्दी में सोशल साइट्स, ब्लॉग्स आदि की उपस्थिति हिन्दी भाषा के विस्तार को सहजता से अभिलक्षित करती है।
(घ)        फ़िल्म और टेलीविजन के क्षेत्र मेंहिन्दी जगत के विस्तारण में भारतीय फ़िल्म और टेलीविजन उद्योग ने एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। पिछले पांच दशकों की बात करें तो देखने को मिलेगा कि भारतीय सिनेमा ने शहरी दर्शकों को ही नहीं गांव के दर्शकों को भी प्रभावित किया है। लोग जिन्हें हिन्दी नहीं आती थी उन्होंने हिन्दी सिनेमा के माध्यम से हिन्दी सीखी है।  टेलिविजन के प्रसार के कारण अब विश्व के प्रत्येक भूभाग में हिन्दी फिल्मों तथा उनके गीतों की लोकप्रियता सर्वविदित है। बात यदि भारतीय सिनेमा की करें तो भाषा का प्रचार-प्रसार, साहित्यिक कृतियों का फिल्मी रुपांतरण, हिंदी गीतों की लोकप्रियता, हिन्दी की उपभाषाओं, बोलियों का सिनेमा और सांस्कृतिक एवं जातीय प्रश्नों को उभारने में भारतीय सिनेमा का योगदान जैसे मुद्दे महत्वपूर्ण ढंग से सामने आते हैं। हिन्दी भाषा की संचारात्मकता, शैली, वैज्ञानिक अध्‍ययन, जन संप्रेषणीयता, संवाद लेखन, दृश्यात्मकता, संक्षिप्त कथन, प्रतीकात्मकता, भाषा-दृश्य की अनुपातिकता आदि मानकों को भारतीय सिनेमा ने गढ़ा है। आज भिन्न भाषा की भारतीय फिल्मों का हिन्दी रूपांतर हो रहा है और वे अपनी मूल भाषा की फ़िल्म से अधिक धनार्जन कर रही हैं क्योंकि भारत में हिन्दी दर्शकों की संख्या में वृद्धि हो रही है। आज हालीवुड के फिल्म निर्माता भी भारत में अपनी विपणन नीति बदल चुके हैं। वे जानते हैं कि यदि उनकी फिल्में हिंदी में रूपांतरित की जाएगी तो यहाँ से वे अपनी मूल अँग्रेज़ी में 'निर्मित चित्रों' के प्रदर्शन से कहीं अधिक मुनाफ़ा कमा सकेंगे। हालीवुड की आज की वैश्विक बाज़ार की परिभाषा में हिंदी जानने वालों का महत्व सहसा बढ़ गया है। यही नहीं, पिछले कुछ वर्षों में कई भारतीय हिन्दी फ़िल्में आस्कर पुरस्कार के लिये नामित हो चुकी हैं और उनमें से कुछ आस्कर जीत भी चुकी हैं। हिन्दी संगीतकारों को आस्कर से नवाजा ज चुका है। शुरुआत में स्टार, सोनी वगैरह दूसरे चैनल अंग्रेजी कार्यक्रम लेकर भारत में आए । मगर इन सबको विवश होकर हिन्दी की रुख करना पड़ा क्योंकि इन्हें अपनी दर्शक संख्या बढ़ानी थी ।  नेशनल ज्योग्राफिक, डिस्कवरी, निक जैसे विदेशी चैनल अपने सारे कार्यक्रम हिन्दी भाषा में प्रस्तुत कर रहें हैं क्योंकि टी. वी. चैनलों एवं मनोरंजन की दुनिया में हिन्दी सबसे अधिक मुनाफे की भाषा बन चुकी है । आज स्पोर्ट्स के चैनल भी अपना प्रसारण हिन्दी भाषा में कर रहे हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि किसी न किसी रूप में हिन्दी का महत्व बढ़ा है और उसने अपने क्षेत्र में परिवृद्धि की है।
(ङ)         समाज, व्यापार और राजनीति के क्षेत्र में : आज हमारे देश में हिन्दी एक ऐसी भाषा बन चुकी है जो कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी और गुजरात से लेकर मिजोरम तक संपर्क भाषा के रूप में प्रयुक्त हो रही है। मेरा यह कथन अतिशयोक्तिपूर्ण प्रतीत हो सकता है, परन्तु यह सच है। भारत के किसी भी राज्य का निवासी जब दूसरे राज्य में जाता है तो वह सबसे पहले हिन्दी भाषा में ही संपर्क करने का प्रयत्न करता है। आज हिन्दी हमारे देश के जन-जन की भाषा बन चुकी है क्योंकि अपने आप को अभिव्यक्त करने के लिये इसका प्रयोग मजदूर, किसान, कुली, मछुआरा, कसाई, रिक्शेवाला, शिक्षक, छात्र, नेता, मंत्री, वकील, अभिनेता, सैनिक, साधु, पत्रकार, पुलिस, महिला, पुरुष सभी करते हैं। भले ही हिन्दी के कई रूप बन चुके हैं जैसे बिहारी हिन्दी, हैदराबादी हिन्दी, बम्बइया हिन्दी, साउथ इन्डियन हिन्दी पर है तो हिन्दी ही और भारत के हर राज्य के लोग इसका प्रयोग अपने सामर्थ्य के अनुसार कर रहे हैं। भारत का कोई व्यक्ति विदेशों में भी यदि दूसरे भारतीय से मिलता है तो वह हिन्दी में ही बात करने की कोशिश करता है। हिन्दी प्रसार की बात करें तो स्वामी रामदेव, जो आसन-प्राणायाम आदि यौगिक क्रियाओं को, कुछ चुने-गिने योगी-साधुओं के घेरे से बाहर लाकर, आम आदमियों को अपनाने का संदेश अपने सहज, सरल किन्तु ओजस्वी हिन्दी प्रवचनों के द्वारा देश-विदेश में फैला रहे हैं । आज श्री श्रीरविशंकर, कृपालु जी, मोरारी बाबू, साध्वी ऋतम्भरा आदि दर्जनों सन्त एवं राम और कृष्ण के कथावाचक अपने हिन्दी प्रवचनों द्वारा लोगों के हृदय में भक्ति-भावना जगा रहे हैं और  स्वामी प्रभुपाद द्वारा स्थापित इस्कोन जैसे दर्जनों संघ संस्थाएं हिन्दीको वह उच्च स्थान दिलाने में संलग्न हैं जहाँ तक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक तथा आर्थिक विनिमय के क्षेत्र में हिंदी के अनुप्रयोग का सवाल है तो यह देखने में आया है कि हमारे देश के नेताओं ने समय-समय पर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर हिंदी में भाषण देकर उसकी उपयोगिता का उद्घोष किया है। यदि अटल बिहारी वाजपेयी तथा पी.वी.नरसिंहराव द्वारा संयुक्त राष्ट्र संघ में हिंदी में दिया गया वक्तव्य स्मरणीय है तो श्रीमती इंदिरा गांधी द्वारा राष्ट्र मंडल देशों की बैठक तथा चन्द्रशेखर द्वारा दक्षेस शिखर सम्मेलन के अवसर पर हिंदी में दिए गए भाषण भी उल्लेखनीय हैं। यूनेस्को के बहुत सारे कार्य हिंदी में सम्पन्न होते हैं। आठवें विश्व हिंदी सम्मेलन न्यूयार्क में संयुक्त राष्ट्रसंघ के महासचिव बान की मून ने और भारत दौरे के दौरान अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने दो-चार वाक्य हिंदी में बोलकर वाह-वाही लूटी। आज के परिपेक्ष्य में देश के विभिन्न हिस्सों में वर्तमान प्रधान मंत्री श्री नरेन्द्र मोदी का हिन्दी में दिया गया भाषण भी सर्वविदित है। मोदी जी ने तो अपने विदेश यात्रा के दौरान अपना भाषण हिन्दी में ही दिया और लोगों ने उसे ध्यान से सुना भी है फिर चाहे वो प्रधानमंत्री का अमेरिका दौरा हो या नेपाल दौरा। जाहिर सी बात है कि हमारे प्रधानमंत्री का कृत्य कहीं कहीं हिन्दी के क्षेत्र को बढ़ाने में कारगर सिद्ध हो रहा है और भविष्य में भी कारगर सिद्ध होगा । दूसरी ओर बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ भारत के बाज़ार में पैठ लगाने हेतु हिंदी की उपयोगिता में उत्तरोत्तर बढ़ोतरी करते जा रही हैं। आज भारत विश्वस्तर पर एक बड़ा बाजार बन चुका है। यहाँ आयात भी हो रहा है निर्यात भी। आज के इस प्रतिस्पर्धा और बाजारीकरण के दौर में विदेशी कंपनियों के भारतीय बाजार में अपने आप को स्थापित करने की होड़ ने भी कहीं न कहीं हिन्दी भाषा के विस्तारीकरण में सहायता प्रदान की है।
(च)        सूचना तकनीक और कम्प्यूटर के क्षेत्र में :      ‘सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में हिन्दी नयी जरुर है पर अक्षम नहीं’ यह विगत कुछ वर्षों में साबित हो चुका है। सूचना प्रौद्योगिकी के अंतर्गत कंप्यूटर के साथ-साथ माइक्रोइलेक्ट्रॉनिक्स और संचार प्रौद्योगिकियाँ भी शामिल है। हिंदी कंप्यूटरीकरण हिंदी भाषा से सम्बन्धित सकल कार्यों को कम्प्यूटर, मोबाइल या अन्य डिजिटल युक्तियों पर कर पाने से सम्बन्धित है। यह मुख्यत: उन साफ्टवेयर उपकरणों एवं तकनीकों से सम्बन्ध रखता है जो कम्प्यूटर पर हिंदी के विविध प्रकार से प्रयोग में सुविधा प्रदान करते हैं। आज मोबाईल में हिन्दी फॉन्ट का प्रयोग तथा ए टी एम, कियोस्क, इलेक्ट्रोनिक डिस्प्ले और साइनबोर्ड में हिन्दी के प्रयोग ने सूचना तकनीक के क्षेत्र में हिन्दी के परिमार्जन को चिह्नित किया है। यूनिकोड के आगमन के बाद से बहुत से सॉफ्टवेयरों, साइटों तथा ऑनलाइन सेवाओं का यूनिकोडकरण शुरु हुआ। आज इनमें से अधिकतर यूनिकोड सक्षम हैं और अब तो फॉन्ट बदलने की सुविधा भी है जिससे नॉन-यूनिकोड फॉन्ट जैसे कृतिदेव आदि चुनकर हिंदी टाइप की जा सकती है। कम्प्यूटर पर हिन्दी में आलेख, सूचियाँ, डेटाबेस, पुस्तकें आदि के लिए टूल्स बन गए हैं तथा इंटरनेट से हिन्दी में ई-मेल, ब्लॉग, कॉन्फ्रेरसिंग करने की भी सुविधा है। फॉन्ट, कन्वर्जन यूटिलिटी, ऑफिस सॉफ्टवेयर, ओसीआर, बोल-पहचान, वर्तनी जाँच, ट्रांसलेशन सपोर्ट मुक्त रूप में मिल रहे हैं। इसके साथ- साथ याहू, गूगल, माइक्रोसॉफ्ट आदि पर हिन्दी भी उपलब्ध है। अपनी तमाम कठिनाईयों के बावजूद भी हिंदी ने जिस तरह प्रौद्योगिकी जगत में अपना पैर जमाया है उसकी भूरि-भूरि प्रशंसा मुक्त कंठ से जितनी ज्यादा की जाए उतना ही कम है। हिंदी अब नई प्रौद्योगिकी के रथ पर आरूढ होकर विश्वव्यापी बन रही है और उसे ई-मेल, ई-कॉमर्स, ई-बुक, इंटरनेट, एस.एम.एस. एवं वेब जगत में बड़ी सहजता से पाया जा सकता है।
हिन्दी जगत : संभावनाएं
     कोई भाषा छोटी या बड़ी नहीं होती बल्कि समाज, देश या विश्व में उसका प्रयोग ही उसे छोटा या बड़ा बनाता है। डॉ जयंती प्रसाद नौटियाल के अनुसार -‘‘हिन्दी जानने वालों की संख्या अब एक अरब, दस करोड़ तीस लाख है”। आज के परिपेक्ष्य में हिन्दी को सबसे अधिक पढ़ी-बोली जाने वाली भाषा के रूप में दूसरा क्रम दिया गया है। आज जिस तरह से भारत विश्व पटल पर एक शक्ति के रूप में उभर रहा है उसे देखते हुए भविष्य में हमारी हिन्दी भाषा के लिये असीम संभावनाएं दिखाई पड़ रही हैं। तकनीक, व्यापार, कम्प्यूटर, रोजगार, शिक्षा, टूरिज्म, प्रबंधन, एविएशन आदि ऐसे कई क्षेत्र हैं जिसमें आने वाले समय के दृष्टिकोण से हिन्दी का भविष्य उज्जवल नजर आ रहा है। भारत देश की विभिन्न स्तर की प्रतिभाएँ नौकरीव्यवसाय के कारण भूमंडल के कोने-कोने में अपने नीड़ का निर्माण कर रही हैं। जो भारतीय विदेशों में जा रहे हैं वे हिंदी को भी अपने साथ ले जा रहे हैं तथा जो काफी पहले से विदेशों में बस कर विदेशी हो गए हैं उन्हें हिन्दी की आवश्यकता महसूस हो रही है। इस प्रकार पूरे वैश्विक परिदृश्य में हिन्दी का प्रसार हो रहा है और इसके भविष्य में भी जारी रहने की प्रबल संभावना है। धरती से ३६००० फीट से भी अधिक ऊँचाई पर हिंदी की कमी का अनुभव होने लगा है तथा विदेशी वायुसेवा कंपनियॉविशेषकर यूरोप की कम्पनियाँ हिंदी को अपनी आवश्यकता बता रही हैं। आस्ट्रियन एयरलाइन्सस्विस एयरलाइन्सएयर फ्रान्स आदि के अनुसार भारतीय यात्रियों की लगातार हो रही वृद्धि को दृष्टिगत करते हुए उन्हें भारत की अपनी प्रत्येक उड़ान में कम से कम ऐसे दो क्रू की आवशयकता महसूस हो रही है जो हिंदी बोलना जानते हों। भूमंडल में भारत देश की उभरती आर्थिक शक्तियाँ  हिंदी भाषा के द्वारा भी मुखरित हो रही हैं। वैश्वीकरण के इस दौर में भारत एक अच्छा उपभोक्ता है, तो फिर उस बाजार की भाषा जाने बिना विक्रेता का लाभ कैसे संभव है ! प्रमाण यह है कि विश्व के लगभग एक सौ पचास विश्वविद्यालयों में हिन्दी को एक विषय के रूप में पढ़ाया जाने लगा है। आज के संदर्भ में विश्व का सबसे तरुण मानव संसाधन होने के कारण भारतीय पेशेवरों की तमाम देशों में लगातार मांग बढ़ रही है । जाहिर है कि जब भारतीय पेशेवर भारी तादाद में दूसरे देशों में जाकर उत्पादन के स्रोत बनेंगे। वहाँ की व्यवस्था परिचालन का सशक्त पहिया बनेंगे तब उनके साथ हिंदी भी जाएगी। ऐसी स्थिति में जहाँ भारत आर्थिक महाशक्ति बनने की प्रक्रिया में होगा वहाँ हिंदी स्वत: विश्वमंच पर प्रभावी भूमिका का वहन करेगी। इस तरह यह माना जा सकता है कि हिंदी आज जिस दायित्व बोध को लेकर संकल्पित है वह निकट भविष्य में उसे और भी बड़ी भूमिका का निर्वाह करने का अवसर प्रदान करेगा। हिंदी जिस गति तथा आंतरिक ऊर्जा के साथ अग्रसर है उसे देखकर यही कहा जा सकता है कि सन २०२० तक वह दुनिया की सबसे ज्यादा बोली व समझी जाने वाली भाषा बन जाएगी यदि निकट भविष्य में बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था निर्मित होती है और संयुक्त राष्ट्र संघ का लोकतांत्रिक ढंग से विस्तार करते हुए भारत को स्थायी प्रतिनिधित्व मिलता है तो वह यथाशीघ्र इस शीर्ष विश्व संस्था की भाषा बन जाएगी। मास्को विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्र विभाग के तहत जनता की समस्याओं का अध्ययन करनेवाले केंद्र के एक विशेषज्ञ, रूस की विज्ञान अकादमी के भूविज्ञान संस्थान के कर्मी रुस्लान दिमीत्रियेव मानते हैं कि भविष्य में हिन्दी बोलनेवालों की संख्या इस हद बढ़ सकती है कि हिन्दी दुनिया की एक सबसे लोकप्रिय भाषा हो जायेगी। सारांश यह कि हिंदी विश्व भाषा बनने की दिशा में उत्तरोत्तर अग्रसर है। भारत के पूर्व प्रधानमंत्री तथा हिन्दी के महान् कवि अटल बिहारी वाजपेयी, संयुक्त राष्ट्रसंघ महासभा को हिन्दीभाषा में संबोधित करने की नींव डाल चुके हैं और उस परंपरा को आगे बढ़ाने का काम हमारे वर्तमान प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी कर रहे हैं। इससे यही प्रतीत होता है कि अब वह दिन दूर नहीं जब भारत के साथ विश्व के अन्य प्रभावशाली देशों के प्रभाव से संयुक्त राष्ट्रसंघ की भाषाओं में हिन्दी भाषा भी जुड़ जाएगी  और भारत के अलावा विश्व के अन्य देश भी संयुक्त राष्ट्रसंघ में हिन्दी में अपने विचार व्यक्त कर सकेंगे तथा सदन की कार्यवाही को हिन्दी में सुन सकेंगे ।इसप्रकार यह कहा जा सकता है कि निकट भविष्य में विश्व की सबसे सशक्त भाषा बनकर उभरेगी जो किसी परिचय की मोहताज नहीं होगी.
                            

-    सुस्मित सौरभ 
महात्मा गाँधी के विचारों का हिन्दी उपन्यास पर प्रभाव
कहा गया है कि साहित्य समाज का दर्पण होता है. किसी भी विशिष्ट देशकाल की भौगोलिक परिस्थितियाँ, सामाजिक विचारधाराएँ, राजनीतिक उथल-पुथल आदि कहीं न कहीं  उस काल के साहित्य को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से प्रभावित अवश्य करते हैं. यहाँ तक की प्राकृतिक आपदाओं जैसे बाढ़, भूकंप, अकाल आदि का भी प्रभाव हमारे साहित्य पर स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है.  सम्पूर्ण विश्व के साहित्य का आकलन किया जाये तो हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि लगभग हर समुदाय, समाज, देश का साहित्य कहीं न कहीं वहाँ के सामाजिक विचारधाराओं से प्रभावित हुआ है और कुछ हद तक उस साहित्य की दिशा भी परिवर्तित हुई है.  इस परिवर्तन के पीछे उस देशकाल के दार्शनिक, विचारक, चिन्तक, उपदेशक, भविष्यवक्ता आदि का प्रमुख योगदान मिलता है. जहाँ मार्क्स, फ्रायड, डार्विन, विवेकानंद आदि विचारकों ने गत सदी में सोचने-समझने की शैली को बदल दिया वहीं सार्त्र, सीमोन, गाँधी, अम्बेडकर, नेहरु ने अपने तरफ से विश्व को आधुनिक बनाने का प्रयास किया और इनकी विचारधारा से एक हद तक हमारा  साहित्य भी प्रभावित हुआ है. यदि भारतीय साहित्य की बात की जाये तो यह रामचंद्र से लेकर कालिदास,तुलसीदास, गाँधी, नेहरु तक के विचारों और दर्शन से प्रभावित दिखाई पड़ता है.
महात्मा गाँधी हमारे देश के राष्ट्रपिता हैं और हमारे देश की आजादी की लड़ाई में उनके और उनकी विचारधाराओं का अप्रतिम योगदान रहा है. सन १९१५ ई. में उनके भारत लौटने के पश्चात  देश की राजनैतिक और सामाजिक स्थिति में कई परिवर्तन हुए. नमक सत्याग्रह, असहयोग आंदोलन, भारत छोड़ो आंदोलन जैसी गतिविधियों ने देश की सोच और विचारधारा में एक क्रांति बहाल की और देश में एक चेतना की लहर दौड़ गई. उनके सत्य, अहिंसा, न्याय, ब्रह्मचर्य, दर्शन आदि सिद्धांतों की मीमांसा की गई और उनपर आधारित साहित्य भी रचे गये. गाँधी जी की विचारधारा का प्रभाव हिन्दी साहित्य के लगभग हर विधा पर सामान रूप से पड़ा. चाहे वो छायावादी काव्य हो या प्रेमचंदयुगीन कहानियाँ और नाटक या फिर प्रमुख ऐतिहासिक और सामाजिक कालजयी उपन्यास, सभी गाँधी रंग में रंगे दिखायी पड़ते हैं.    
हिन्दी उपन्यासों पर गाँधी जी के विचारों के प्रभाव को सहजता से रेखांकित किया जा सकता है. गाँधीवादी विचारधारा से प्रभावित उपन्यासकारों में प्रेमचंद, जैनेन्द्र कुमार, सियारामशरण गुप्त, गिरिराज किशोर, यशपाल आदि के नाम प्रमुख हैं. इन उपन्यासकारों द्वारा महात्मा गाँधी के विचारों एवं जीवनदृष्टि के आधार पर औपन्यासिक चरित्रों का प्रतिरूप बनाया गया, उनके जीवन की घटनाओं का प्रतिबिम्ब प्रस्तुत किया गया, उनके आंदोलनों के चित्र दर्शन के साथ उनके सिद्धांतों से जुड़ी कथाओं की रचना की  गयी.
प्रस्तुत विषय की चर्चा करने के संदर्भ में हमारे मानस पटल पर एक प्रमुख नाम हमारे कालजयी उपन्यासकार प्रेमचंद का आता है. प्रेमचंद गाँधीवादी आदर्श जीवन प्रणाली तथा सत्य और अहिंसा के प्रबल समर्थक थे. व्यावहारिक जीवन में उन्होंने गाँधी जी के रचनात्मक कार्यों को पूर्णतः स्वीकार किया. प्रेमचंद के उपन्यासों पर गाँधीवादी जीवन का प्रभाव स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है. उनके गोदान पूर्व लगभग सभी उपन्यास गाँधी दर्शन से प्रभावित नजर आते हैं जिनमें प्रेमाश्रम, रंगभूमि, कायाकल्प, कर्मभूमि आदि प्रमुख हैं. गाँधी युग में प्रेमचंद का राष्ट्रीय प्रेम का स्वर अधिक सशक्त हुआ और वे अपने आप को महात्मा गाँधी के व्यक्तित्व के जादुई प्रभाव से बचा न सके . ‘प्रेमाश्रम’ उपन्यास में  प्रेमचंद लखनपुर गाँव में एक आदर्श राज की स्थापना करते हैं जहाँ सत्य, प्रेम, अहिंसा त्याग की महत्ता को निरुपित किया गया है और साथ ही साथ हृदय परिवर्तन के सिद्धांत की भी सिफारिश की गई है. गाँधी जी की भांति प्रेमचंद भी यह स्वीकारते हैं कि किसानों और जमींदारों के सम्बन्ध प्रेमपूर्ण हो सकते हैं. उनके दूसरे उपन्यास ‘रंगभूमि’ का नायक सूरदास तो गाँधी का प्रतिरूप दिखायी पड़ता है. सरकार और जनसेवक के विपक्ष में सूरदास की अहिंसक लड़ाई का चित्रण प्रेमचंद ने अपने इस उपन्यास में किया है. ‘कायाकल्प’ में दृष्टिगत होता है कि मनुष्य ऐश्वर्य और विलास के पीछे किस तरह पतित हो जाता है? वहीं ‘गबन’ में विलासिता और भौतिकवाद के पीछे पड़कर पर्यवसान की ओर संकेत कर सेवा और त्याग की महिमा गुणगान किया गया है. ‘कर्मभूमि’ में गाँधी जी के व्यवहारिक कार्यक्रमों का गाँव में प्रचार चित्रित किया गया है और सूत-कताई, बुनाई, हरिजनोद्धार, शराबबंदी आदि को  कथातत्व में प्राथमिकता दी गई है. पात्रों का हृदय परिवर्तन होना, उनके द्वारा अपनी संपत्ति का दान कर सेवा मार्ग अपना और नारियों का राष्ट्र सेवा के लिये तत्पर होना गाँधी युगीन प्रभाव को अभिलक्षित करता है. प्रेमचंद की साहित्य दृष्टि  गोदान तक आते आते थोड़ी परिवर्तित तो जरुर होती  है पर उसमें हृदय परिवर्तन, जन सेवा जैसी  भावनाओं का लोप नहीं होता.
गाँधीवादी विचारधारा से प्रेरित उपन्यासकारों में दूसरा प्रमुख नाम सियारामशरण गुप्त जी का आता है. इनका प्रथम उपन्यास “गोद” १९३२ ई  में प्रकाशित हुआ जिसमें गाँधीवादी जीवन दर्शन की आध्यात्मिक चेतना व्यक्त हुई है. गुप्त जी प्रेमचंद युगीन उपन्यासकार हैं और इस युग की व्यापक मनोभूमि गाँधीवादी ही थी. उनके उपन्यासों पर गाँधीवाद का बाह्य प्रभाव नहीं है, परन्तु उनके व्यक्तित्व में गाँधीवाद के सिद्धांत-पक्ष का पूर्णतः पालन हुआ है. सियारामशरण गुप्त के तीन उपन्यासों ‘गोद’, ‘अंतिम आकांक्षा’ और ‘नारी’ में गाँधी के अध्यात्म पक्ष को प्रधानता मिली है. गाँधीवाद अध्यात्मिक स्तर पर हृदय परिवर्तन और आत्मपीड़न के सिद्धांत को मान्यता देता है. ‘गोद’ में किशोरी की व्यथा से शोभाराम का हृदय परिवर्तन होता है और वह समाज के सारे बंधन तोड़ कर उसे स्वीकार करता है.  ‘अंतिम आकांक्षा’ में रामलाल जैसे सामान्य व्यक्ति के हृदय की स्वच्छता को रेखांकित किया गया है. नायक निम्न-जाति का सत्यनिष्ठ व्यक्ति है जिसके हाथ से एक डाकू की हत्या हो गयी है. वह समाज के अन्यायपूर्ण बंधनों को सहकर अपनी मानवीय श्रेष्ठता का परिचय देता है. वहीं ‘नारी’ में जमुना अपने पुत्र से कहती है –“ सह ले इसे सह ले. कमजोर क्यों पड़ता है? जितना ही अधिक सह सकेगा, उतना ही तू बड़ा होगा.” इस प्रकार सियारामशरण गुप्त के उपन्यास के पात्रों के कथन में गाँधी जी के सन्देश की आहट स्पष्ट मिलती है.   
गाँधीवाद से प्रभावित लेखकों में  एक महत्वपूर्ण नाम जैनेन्द्र का आता है. जैनेन्द्र भी गाँधीवाद के अध्यात्मपक्ष पर बल देते हुए आत्मपीड़न द्वारा हृदय परिवर्तन में विश्वास करते हैं. “परख” में गाँधीवाद का प्रभाव ‘सत्यधन’ पर बाह्य रूप में पड़ता है वही ‘बिहारी’ का व्यक्तित्व पूर्ण रूप से गाँधीवाद से अनुप्राणित जान पड़ता है. वहीं   ‘सुखदा’ , ‘सुनीता’ , ‘व्यतीत’, ‘जयवर्धन’ और ‘विवर्त’ में जैनेन्द्र  नारी के परपुरुष से प्रेम करने के मनोवैज्ञानिक समस्या का समाधान गाँधीवादी दृष्टिकोण से हृदय परिवर्तन के सिद्धांत द्वारा खोजने का प्रयास करते हैं. उन्होंने अहम की निस्सारता दिखाकर समर्पण द्वारा स्व और पर में अभेद सम्बन्ध स्थापित करने की चेष्टा की है. इसीलिये उनके उपन्यासों में कामपीड़ा और समर्पण का चित्रण कर अहम् का विसर्जन करने किया गया है. वैसे, जैनेन्द्र के उपन्यासों में गाँधीवाद का प्रभाव का निरूपण कुछ सीमा तक ही मिलता है.
उपरोक्त उपन्यासकारों के आलावा कई अन्य नाम और भी हैं जिनके उपन्यासों पर आंशिक या छिटपुट रूप से गाँधीवाद का असर देखने को मिलता है. ‘अमृतलाल नागर’ के उपन्यास ‘बूँद और समुद्र’ प्राचीन रूढ़ियों के खोखलेपन, जातिभेद आदि पर प्रकाश डाला गया है साथ ही उपन्यास का सूत्रधार बाबा रामजी पूर्णतः गाँधीवादी और सर्वोदयी के रूप में चित्रित हुआ है. फणीश्वर नाथ रेणु के उपन्यास मैला आँचल का पात्र बावनदास भी गाँधीवादी व्यक्ति है जो सर्वोदय और स्वराज की बातें करता है. इस उपन्यास के पूरे कथानक में महात्मा गाँधी (गनही महातमा) का जिक्र कई बार हुआ है. कुछ ऐसे उपन्यास हैं जिनका उपजीव्य सन् १९४२ का भारत छोड़ो आन्दोलन बना है . इनमें ‘बयालीस’ (प्रतापनारायण मिश्र), ‘श्वेतपत्र’( विवेकीराय), ‘देशद्रोह’ और ‘मेरी तेरी उसकी बात’ (यशपाल), ‘बीज’ (अमृतराय), ‘जिच’ (मन्मथनाथ गुप्त), ‘बलिदान’ (रघुवीर शरण मिश्रा), ‘सीधी सच्ची बातें’ (भगवती चरण वर्मा) आदि  प्रमुख हैं. इनके अलावा गिरिराज किशोर द्वारा रचित ‘पहला गिरमिटिया’ आज के परिपेक्ष्य में एक उत्कृष्ट उपन्यास है जो महात्मा गाँधी जी के जीवन से प्रभावित है. इसमें किशोर जी ने महात्मा गाँधी के दक्षिण अफ्रीका में साम्राज्यवादी  शक्तियों से संघर्ष के इतिहास को उपन्यास का कथ्य बनाया है.
इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि गाँधी जी का प्रभाव केवल उनके युग में ही नहीं अपितु आज के आधुनिक युग के उपन्यासकारों पर भी सहजता से देखने को मिलता है. गाँधी जी एक युग पुरुष हैं और उनके कृत्य साहित्य रचना को आने वाले भविष्य में भी दिशा निर्देशन देते रहेंगे और भविष्य में उनके प्रभाव से पूर्ण साहित्य की रचना होती रहेगी.

संदर्भ –
                  हिन्दी का गद्य-साहित्य – डॉ रामचंद्र तिवारी
                  हिन्दी साहित्य और संवेदना का विकास – रामस्वरूप चतुर्वेदी
                  रंगभूमि – प्रेमचंद
                  नारी – सियाराम शरण गुप्त
                  मैला आँचल – फणीश्वर नाथ रेणु
                  पहला गिरमिटिया- गिरिराज किशोर


सुस्मित सौरभ