रविवार, 5 जुलाई 2015

          मीडिया में हिन्दी
भारतभूमि के गौरवशाली अतीत में हिन्दी भाषा के अभिव्यक्ति में प्रयोग की एक सुदीर्घ और विस्तृत परंपरा मिलती है। साहित्यकारों और इतिहासकारों के मतानुसार हिन्दी भाषा का उद्गम १०वीं शताब्दी के आसपास माना गया है और तब से लेकर आजतक हिन्दी भाषा पूरे भारत में बोली और समझी जाती रही है। हिन्दी  भाषा की बढ़ती जा रही लोकप्रियता का अंदाजा इसी से ही लगाया जा सकता है कि सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में हिन्दी  सीखने वालों की संख्या में जबरदस्त बढ़ोत्तरी हुई है। पिछले १०-१२ वर्षों में हिन्दी  बोलने वालों की संख्या में कई गुना वृद्धि दर्ज की गई है।  देश में विदेशियों के आधिपत्य एवं गुलामी के दिनों में यहाँ अँग्रेज़ी शासनकाल होने की वजह से, अँग्रेज़ी का प्रचलन बढ़ गया था। लेकिन स्वतंत्रता के पश्चात देश के कई हिस्सों को एकजुट करने के लिए एक ऐसी भाषा की ज़रूरत थी जो सर्वाधिक बोली जाती है, जिसे सीखना और समझना दोनों ही आसान हों तब विकल्प के रूप में हमारे समक्ष एक ही भाषा थी जो अपने लक्ष्य में सफल सिद्ध हो सकती थी वो थी हिन्दी। आज भारत का लगभग पूरा जनआवाम हिन्दी भाषा को समझ या बोल सकता है। लेकिन यह बड़े दुःख की बात है कि इस गौरवमयी भाषा को अब तक राष्ट्रभाषा का दर्जा नहीं मिल सका और यह आज भी राजभाषा और संपर्कभाषा ही बनी हुई है। विश्व में प्रत्येक सम्मुन्नत, स्वतंत्र और स्वाभिमानी राष्ट्र की अपनी एक राष्ट्रभाषा है। इंगलैंड, अमेरिका, रूस, जर्मनी, चीन, फ़्रांस जैसे सभी देशों में वहाँ की एक व्यापक प्रचलित भाषा राष्ट्रभाषा के रूप में व्यवहृत होती है। पर अफ़सोस कि हमारे देश भारत में आज भी कोई राष्ट्रभाषा नहीं है। इसका कारण चाहे हमारी सैकड़ों वर्षों की दासता हो या क्षेत्रीय राजनीति या कुछ और, लेकिन यह सर्वविदित है कि हमारी हिन्दी विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र की सबसे लोकप्रिय भाषा बनी हुई है और इसमें कोई संदेह नहीं कि हिन्दी के क्षेत्र में काफी विकास और विस्तार हुआ है। हिन्दी के प्रयोग को बढ़ाने के लिये कई महत्वपूर्ण और रचनात्मक कदम उठाये गये हैं और हमें काफी हद तक सफलता भी मिली है। भूमंडलीकरण के इस दौर में हिन्दी कई क्षेत्रों में अपने पैर जमाती नजर आती है जिसमें मीडिया का क्षेत्र एक प्रमुख क्षेत्र के रूप में उभर कर सामने आ रहा है.
मीडिया और जनसंचार में हिन्दी   :
     मनुष्य की भाषायी अथवा कलात्मक अभिव्यक्ति को एक से अधिक व्यक्तियों तथा स्थानों तक पहुँचाने की व्यवस्था को जनसंचार का नाम दिया गया है। आधुनिक युग में इस जनसंचार शब्द का स्थान ‘मीडिया’ शब्द ने ले लिया है जो अंग्रेजी के ‘मीडियम’ शब्द से व्युत्पन्न माना जा सकता है। पिछली कई सदियों से प्रिंट मीडिया इस संदर्भ में अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता आ रहा है, जहाँ हमारी लिखित अभिव्यक्ति पहले तो पाठ्य रूप में प्रसारित होती रही तथा बाद में छायाचित्रों का समावेश संभव होने पर दृश्य अभिव्यक्ति भी प्रिंट मीडिया के द्वारा संभव हो सकी। बाद में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने भी साथ-साथ अपनी जगह बनाई, जहाँ पहले तो श्रव्य अभिव्यक्ति को रेडियो के माध्यम से प्रसारित करना संभव हुआ तथा बाद में टेलीविजन के माध्यम से श्रव्य-दृश्य दोनों ही अभिव्यक्तियों का प्रसारण संभव हो सका। प्रिंट मीडिया की अपेक्षा यहाँ की दृश्य अभिव्यक्ति अधिक प्रभावी हुई, क्योंकि यहाँ चलायमान दृश्य अभिव्यक्ति भी संभव हुई। भारत वर्ष में प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मिडिया के सम्प्रेषक भाषा के रूप में हिन्दी और अंग्रेजी दोनों का  प्रयोग प्रमुखता से हुआ। बल्कि यह कहा जा  सकता है कि हिन्दी बड़े ही सशक्त रूप में जनसंचार की भाषा बनी और इसका विस्तारीकरण होता गया। बीसवीं सदी में कंप्यूटर के विकास के साथ-साथ एक नए माध्यम ने जन्म लिया, जो डिजिटल था और इस प्रकार डिजिटल मिडिया का सूत्रपात हुआ । प्रारंभ में डाटा के सुविधाजनक आदान-प्रदान के लिए शुरू की गई कंप्यूटर आधारित सीमित इंटरनेट सेवा ने आज विश्वव्यापी रूप अख्तियार कर लिया है। इंटरनेट के प्रचार-प्रसार और निरंतर तकनीकी विकास ने एक ऐसी वेब मीडिया को जन्म दिया, जहाँ अभिव्यक्ति के पाठ्य, दृश्य, श्रव्य एवं दृश्य-श्रव्य सभी रूपों का एक साथ क्षणमात्र में प्रसारण संभव हुआ और इसे ‘न्यू मिडिया’ का नाम दिया गया। न्यू मीडियापर अपनी अभिव्यक्ति के प्रकाशन-प्रसारण के अनेक रूप हैं। कोई अपनी स्वतंत्र वेबसाइटनिर्मित कर वेब मीडिया पर अपना एक निश्चित पता आौर स्थान निर्धारित कर अपनी अभिव्यक्तियों को प्रकाशित-प्रसारित कर सकता है। अन्यथा बहुत-सी ऐसी वेबसाइटें उपलब्ध हैं, जहाँ कोई भी अपने लिए पता और स्थान आरक्षित कर सकता है। अपने निर्धारित पते के माध्यम से कोई भी इन वेबसाइटों पर अपने लिए उपलब्ध स्थान का उपयोग करते हुए अपनी सूचनात्मक, रचनात्मक, कलात्मक अभिव्यक्ति के पाठ्य अथवा ऑडियो/वीडियो डिजिटल रूप को अपलोड कर सकता है, जो तत्क्षण दुनिया में कहीं भी देखे-सुने जाने के लिए उपलब्ध हो जाती है। बहुत-सी वेबसाइटें संवाद के लिए समूह-निर्माण की सुविधा देती हैं, जहाँ समान विचारों अथवा उद्देश्यों वाले लोग एक-दूसरे से जुड़कर संवाद कायम कर सकें। आज के संदर्भ में वेबग्रुपकी इस अवधारणा से तहत फेसबुक और ट्विटर जैसी ऐसी वेबसाइटें भी मौजूद हैं, जो प्रायः पूरी तरह समूह-संवाद केन्द्रित हैं। दूसरे शब्दों में इसे सोशल नेटवर्किंग का नाम दिया गया है। न्यू मीडियासे जो एक अन्य सर्वाधिक लोकप्रिय उपक्रम जुड़ा है, वह हैब्लॉगिंगका। अभिव्यक्ति के अनुसार ही ब्लॉग पाठ्य ब्लॉग, फोटो ब्लॉग, वीडियो ब्लॉग (वोडकास्ट), म्यूजिक ब्लॉग, रेडियो ब्लॉग (पोडकास्ट), कार्टून ब्लॉग आदि किसी भी तरह के हो सकते हैं। अधिकांश लोग न्यू मीडिया का अर्थ इंटरनेट के जरिए होने वाली पत्रकारिता से लगाते हैं। लेकिन न्यू मीडिया समाचारों, लेखों, सृजनात्मक लेखन या पत्रकारिता तक सीमित नहीं है। वास्तव में न्यू मीडिया की परिभाषा पारंपरिक मीडिया की तर्ज पर दी ही नहीं जा सकती। न सिर्फ समाचार पत्रों की वेबसाइटें और पोर्टल न्यू मीडिया के दायरे में आते हैं बल्कि नौकरी ढूंढने वाली वेबसाइट, रिश्ते तलाशने वाले पोर्टल, ब्लॉग, स्ट्रीमिंग ऑडियो-वीडियो, ईमेल, चैटिंग, इंटरनेट-फोन, इंटरनेट पर होने वाली खरीददारी, नीलामी, फिल्मों की सीडी-डीवीडी, डिजिटल कैमरे से लिए फोटोग्राफ, इंटरनेट सर्वेक्षण, इंटरनेट आधारित चर्चा के मंच, दोस्त बनाने वाली वेबसाइटें और सॉफ्टवेयर तक न्यू मीडिया का हिस्सा हैं। आज हमारे लिये यह बड़े हर्ष की बात है कि उपरोक्त सभी माध्यमों में हिन्दी पदार्पण किया है और यह अपने प्रगति के राह पर उत्तरोतर आगे की ओर बढ़ती जा रही है.
वेब का हिन्दी  पाठक-वर्ग आरंभिक दौर में अधिकतर ऐसे लोग थे जो वेब पर अपनी भाषा पढ़ना चाहते थे, कुछ ऐसे लोग थे जो विदेशों में बसे हुए थे किंतु अपनी भाषा से जुड़े रहना चाहते थे या कुछ ऐसे लोग जिन्हें किन्हीं कारणों से हिन्दी  सामग्री उपलब्ध नहीं थी जिसके कारण वे किसी भी तरह की हिन्दी  सामग्री पढ़ने के लिए तैयार थे। आज परिस्थितियां बदल गई हैं, मुख्यधारा वाला मीडिया आनलाइन उपलब्ध है और पाठक के पास सामग्री चयनित करने का विकल्प है। विशुद्ध साहित्यिक रुचि रखने वाले लोग भी अब वेब पाठक हैं और वे वेब पर लंबी हिन्दी कहानियां व साहित्य पढ़ते हैं। उनकी सुविधा को देखते हुए भविष्य में साहित्य डाऊनलोड करने का प्रावधान अधिक उपयोग किया जाएगा ऐसी प्रबल संभावना है।  साहित्यिक वेबसाइटें स्तरीय साहित्य का प्रकाशन कर रही हैं और वे निःसंदेह साहित्यिक भाषा का उपयोग कर रही हैं लेकिन उनके पास ऐसा पाठक वर्ग तैयार हो चुका है जो साहित्यिक भाषा को वरीयता देता है।
यदि बात जनसंचार के माध्यमों में भागीदारी की करें तो हिन्दी का स्थान भारत में ही नहीं विश्व में भी सर्वोपरि है। फिर बात समाचार पत्र की हो या रेडियो की, या उपग्रह चैनल, सोशल साइट्स और ब्लॉग की। आज विश्व में सबसे ज्यादा पढ़े जानेवाले समाचार पत्रों में आधे से अधिक हिन्दी के हैं। यदि भारत की बात की जाये तो यहाँ सर्वाधिक समाचार पत्र हिन्दी भाषा में ही प्रकाशित होते हैं। इसका आशय यही है कि पढ़ा-लिखा वर्ग भी हिन्दी के महत्त्व को समझ रहा है। वस्तुस्थिति यह है कि आज भारतीय उपमहाद्वीप में ही नहीं बल्कि दक्षिण पूर्व एशिया, मॉरीशस, चीन, जापान, कोरिया, मध्य एशियाअफ्रीका, यूरोप, कनाडा तथा अमेरिका तक में हिन्दी कार्यक्रम उपग्रह चैनलों के जरिए प्रसारित हो रहे हैं और भारी तादाद में उन्हें दर्शक भी मिल रहे हैं। आज मॉरीशस में हिन्दी  सात चैनलों के माध्यम से धूम मचाए हुए है। विगत दो दशकों  में एफ.एम. रेडियो के विकास से हिन्दी  कार्यक्रमों का नया श्रोता वर्ग पैदा हो गया है। बी बी सी लन्दन, रेडियो रूस, रेडियो डॉयचेवेले जैसे कई महत्वपूर्ण रेडियो चैनल हैं जो कई दशकों से हिन्दी में कार्यक्रम प्रस्तुत करते आ रहे हैं जिससे हिन्दी के विस्तार को काफी बढ़ावा मिला है। फिज़ी में रेडियो नवरंगऐसा रेडियो स्टेशन है, जो २४ घण्टे हिन्दी  कार्यक्रम पेश कर रहा है। भारत में टेलीविजन के समाचार के चैनल की बात की जाए तो अधिकतर चैनल हिन्दी भाषा में ही समाचार प्रस्तुत करते हैं और दिन प्रतिदिन इनकी संख्या में वृद्धि हो रही है। इंटरनेट पर हिन्दी के अनेक पोर्टल हैं। फेसबुक, व्हाट्स अप्प, ट्विटर, ब्लॉग आदि पर हिन्दी भाषा देवनागरी लिपि में भी लिखी जाने लगी है जो कुछ वर्ष पूर्व रोमन में लिखी जाती रही थी। इंटरनेट पर हिन्दी ब्लॉग की बाढ़ सी आ रखी है। देश ही नहीं विदेशों से भी ब्लॉग लेखन का काम हिन्दी में हो रहा है और साथ ही साथ लोग विदेशों में इन्हें बड़ी सजगता से पढ़ भी रहें हैं। इस प्रकार इंटरनेट जैसे वैश्विक माध्यम पर हिन्दी में सोशल साइट्स, ब्लॉग्स आदि की उपस्थिति हिन्दी भाषा के विस्तार को सहजता से अभिलक्षित करती है।
इस प्रकार हम देखते हैं कि काफी अल्प समय में हिन्दी ने डिजिटल मिडिया के क्षेत्र में जिस प्रकार से अपना एक अहम स्थान बनाया है, नया प्रतीमान स्थापित किया है। उससे आज के समय में जनसंपर्क के क्षेत्र में हिन्दी भाषा का भविष्य उज्जवल दिखाई दे रहा है। साथ ही यह स्पष्ट होता है कि किसी न किसी रूप में हिन्दी का महत्व बढ़ा है और उसने अपने क्षेत्र में परिवृद्धि की है।
                                                                     -सुस्मित सौरभ                                                      

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