शुक्रवार, 27 मार्च 2015



                      शोध आलेख
नेहरु और भारत की खोज
‘भारत की खोज’ (Discovery of India) हमारे भारतवर्ष के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरु द्वारा लिखी गई पुस्तकों में से एक प्रमुख ऐतिहासिक कृति है।  इस पुस्तक की रचना पंडित नेहरु द्वारा अहमदनगर जेल में अपने कारावास के दिनों को व्यतीत करने के क्रम में की गई।  मूलतः, अंग्रेजी भाषा में रचित इस पुस्तक के रचना की शुरुआत नेहरु जी ने स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में अप्रैल १९४४ में किया और पांच महीने की अवधि में सितम्बर १९४४ में इस  पुस्तक की रचना पूर्ण हुई।  हालाँकि कुछ लोग इसकी रचना की शुरुआत वर्ष १९४१ भी बताते है।  ‘भारत की खोज’ का प्रथम प्रकाशन वर्ष १९४६ में अंग्रेजी भाषा में हुआ तत्पश्चात यह पुस्तक हिन्दी और अन्य भाषाओं में अनुवादित हुई ।  आज यह पुस्तक भारत के कालजयी कृतियों में अपना  एक महत्पूर्ण स्थान रखती है।  
नेहरु जी ने भारत की खोज एक इतिहासकार के रूप न करके एक वैज्ञानिक, एक समाजशास्त्री, एक साहित्यकार के रूप में किया है।  ऐतिहासिक दृष्टि से इस पुस्तक के आँकड़े संगत भले ही प्रतीत नहीं होते परन्तु वैज्ञानिक, साहित्यिक, सामाजिक और अन्य दृष्टियों से यह पुस्तक हमारे मन मष्तिष्क पर एक अमिट छाप छोड़ने में सफल सिद्ध होती है।  जैसा कि पूर्व विदित है कि इस पुस्तक की रचना अहमदनगर जेल के उबाऊ और एकरसतापूर्ण परिवेश में की गई सो इसका प्रभाव नेहरु जी के वर्तमान और वैचारिक ऊहापोह के रूप में उनके पुस्तक के आरम्भ के एक बड़े हिस्से पर स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है साथ ही साथ इसका स्पष्ट प्रभाव इतिहास को लेकर उनके सोच पर झलकता है।  यहाँ भारत की खोज की रचना नेहरु जी के लिये इतिहास लेखन का या कोई शोधपरक कार्य नहीं है।  उन्होंने यहाँ अपने निजी जीवन, अपने वर्तमान जीवन की गुत्थियों को सुलझाने का प्रयास किया है।  नेहरु जी ने इतिहास लेखन की ओर अपना कदम तो बढ़ाया था परन्तु उनका यह लेखन वर्तमान और भविष्य के तलाश के साथ साथ मानवीय संबंधों की संश्लिष्टता को समझने के एक प्रयत्न था।  नेहरु जी का अतीत से साक्षात्कार का आलोचनात्मक नजरिया उन्हें वैज्ञानिक दृष्टिकोण प्रदान करता है।  नेहरु जी कोई इतिहासकार नहीं थे और न ही उन्होंने कभी ये दावा किया।  उनके अतीत की खोज में वैज्ञानिकता का आभास मिलता है।  भारत की खोज के बहाने उनका प्रयास देश और समाज के विशाल जन आवाम को अतीत की अच्छी और बुरी बातों से अवगत करने का था।  नेहरु जी के व्यक्तित्व के सामान ही उनके इतिहास का फलक असाधारण रूप से विशालकाय है।  भले ही आंकड़ों की दृष्टि से नेहरु जी का इतिहास ज्ञान ज्यादा समृद्ध न हो पर इस पुस्तक से उनके इतिहास ज्ञान की विविधता और नजरिये के समृद्धता का पता अवश्य चलता है।  
भारत की खोज, नेहरु जी द्वारा भारतवर्ष का मानवीकरण है जो अनेक रहस्यों, मान्यताओं, विश्वासों से लिप्त पड़ा है।  भारत के गौरवपूर्ण इतिहास में उन्हें भारत का विशाल जन आवाम दिखाई पड़ता है।  वे कभी वेदांत दर्शन से प्रभावित होते हैं तो कभी तो कभी बौद्ध धर्म और भारतीय दर्शन उन्हें अपनी ओर आकर्षित करते हैं।  वे व्यक्तिगत स्वतंत्रता के पक्षधर दिखाई पड़ते है।  इतिहास नेहरु जी के लिये किसी व्यक्ति विशेष का जमा हिसाब न होकर समूहों की दास्तान है।  इसीलिये नेहरु जी के भारत की खोज की  वर्णनात्मक न होकर आत्मकथात्मक हो गई है।   वे पुराकालिक आदिमानव की बात करते हैं, उसके सभ्‍य होने की दास्‍तान कहते हैं, मिस्र, सुमेर, अक्‍कद और बेबीलोन की सभ्‍यता की बातें करते हैं, हडप्पा और आरंभिक चीन की संस्‍कृति, अजटेक, माया, इंका, ग्रीस, रोम, मध्‍य और आधुनिक योरप का उल्‍लेख करते हैं।  इसी के साथ, इंग्‍लैंड, फ्रांस और डच साम्राज्‍यवाद, अमरिका के स्‍वाधीनता आंदोलन और गृह युद्ध, एशिया एवं अरब के राष्‍ट्रवादी उत्थानों,महायुद्द, पूंजीवाद की समस्‍यायें, नाजीवाद, फासीवाद और अमरिका का एक विश्‍व शक्ति के रुप में उदय की बात भी कहते हैं। उनके इतिहास लेखन की शुरुआत सिंधु  सभ्यता से होती है जो अरबों, अफगानों, तुर्कों से होते हुए इस्लाम के आगमन से लेकर चंद्रगुप्त और अशोक तक जाती है।  भारत का वर्णन करने के क्रम में वे लिखते हैं कि यहाँ वेद, उपनिषद और वेदांत हैं, यहाँ एक समृद्ध सभ्यता है जहाँ दर्शन, कला, साहित्य, विज्ञान , गणित, अर्थशास्त्र विकसित हैं और दूसरे देशों से संपर्क भी है।  लेकिन फिर भी यह भारत कमजोरी का शिकार हो जाता है और भारत कि राजनैतिक दशा चरमरा जाती है।  सामाजिक संरचना में अलगाव और कठोरता का विकास होने लगता है, सामाजिक कुरीतियाँ जन्म लेने लगती हैं।  नेहरु जी ने ये माना है कि मुगलों के भारत में आगमन से यहाँ समृद्धि का प्रवेश होता है।  भले ही कई विद्वानों ने उनके कथन का पुरजोर विरोध किया लेकिन व्यावहारिक दृष्टि से नेहरु जी बिल्कुल सही थे।  हाँ, उन्होंने यह भी लिखा कि यह समृद्धि उस काल के शासक के व्यक्तित्व पर आश्रित थी और इसके संदर्भ में अकबर का संदर्भ भी दिया।  अठारहवीं शताब्दी में राजनैतिक कमजोरियों से भारत में अंग्रेजों के स्वागत का द्वार खुल गया और इस संदर्भ में उनका मत है कि हम करीब करीब भारत के प्रगति, विकास और पतन को माप सकते हैं।  जब भारत खुले मन से बाह्य विश्व का स्वागत कर रहा था तो वह विकसित था और जब उसने अपने आप को संकुचित कर लिया तो वह पतनोन्मुख हो गया। नेहरु के इस इतिहास लेखन की कुछ कमियों को कालांतर में उजागर किया गया जो निम्न है-
·             नेहरु जी के भारत की खोज उत्तर भारत तक ही सीमित रही और दक्षिण के चोल, चालुक्य, आंध्र आदि राजवंशों का परिचय मात्र मिलता है।
·             नेहरु जी ने मुस्लिम आक्रमणकारियों की आलोचना के स्थान पर उनके विकास के कार्यों कि सराहना की।  उनके इस कृति में अकबर की खूब प्रशंसा है परन्तु महाराणा प्रताप का जिक्र तक नहीं है।
·             उनके सबसे प्रसिद्ध बायोग्राफर एस। गोपाल ने नेहरु के भारत की खोज को अनेकों किताबों और अध-पके मार्क्‍सवादी विचारधारा का जल्‍दबाजी में लिखा किताब माना है और एक अन्‍य ने तो उन्‍हे रोमानी इतिहासकार कह कर खारिज कर दिया।  
·             कुछ राजनितिक दलों ने यह आरोप लगाया कि इस किताब में एक पैराग्राफ़ में शिवाजी पर आपत्तिजनक बातें लिखी गई हैं।

भारत एक खोजका पहला एपिसोड 1988 में प्रसारित किया गया था। यह धारावाहिक पंडित जवाहरलाल नेहरु की लिखी हुई एक प्रसिद्ध पुस्तक ‘भारत की खोज’ पर आधारित है, निर्माता थे श्याम बेनेगल। पंडित नेहरू की इस कृति पर 52 कड़ियों का विशाल धारावाहिक बना चुके प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक श्याम बेनेगल ने इस बारे में कहा कि नेहरू का दृष्टिकोण पूरी तरह राष्ट्रीय था। यह बात उनकी प्रसिद्ध कृति से भी साबित होती है।  
बेनेगल ने कहा कि 'भारत एक खोज' नेहरू जी ने अहमदनगर जेल में लिखी थी।  उन्होंने कहा कि यह चूंकि आजादी से पहले लिखी गई थी लिहाजा, इसमें नेहरू के सामने वे सवाल थे जो भारत के समक्ष स्वतंत्रता के बाद आने वाले थे।  उन्होंने कहा कि राष्ट्र राज्य की धारणा पश्चिम से आई थी।  
पुस्तक के ‘तलाश’ शीर्षक में नेहरु जी लिखते हैं – “भारत मेरे खून में रचा बसा था।  इसके बावजूद मैंने उसे बाहरी आलोचक की नजर से देखना शुरू किया।  ऐसा आलोचक जिसने वर्तमान के साथ साथ अतीत के बहुत से अवशेषों को, जिन्हें उसने देखा था, नापसंद करता था।  एक हद तक मैं उस तक पश्चिम के रास्ते से होकर पहुँचा।
डिस्कवरी ऑफ इंडिया की चर्चा करते हुए वरिष्ठ नेता नटवर सिंह ने कहा कि निःसंदेह यह कृति उत्कृष्ट साहित्य का नमूना है।  हालांकि यह बात दीगर है कि कई लोग इसके इतिहास संबंधी कुछ अंशों से सहमत नहीं है।
हिंदी के वरिष्ठ साहित्यकार राजेंद्र यादव के अनुसार, जवाहरलाल नेहरू ने अपनी रचना डिस्कवरी ऑफ इंडिया में भारतीय इतिहास की रूपरेखा प्रस्तुत की थी।  उसे श्याम बेनेगल ने 'भारत की खोज' के जरिए वातावरण के माहौल में ढालने का प्रयास किया था।  यह सांस्कृतिक और साहित्यिक हिसाब से अच्छा प्रयास किया गया था।
वरिष्ठ फिल्म समीक्षक विनोद भारद्वाज के अनुसार, डिस्कवरी आफ इंडिया पर आधारित भारत की खोज अच्छा सीरियल था और श्याम बेनेगल की कृति 'वेल रिसर्च' पर आधारित थी।  बेनेगल का वह बढ़िया प्रयास था।
 उपरोक्त कथन नेहरु जी की भारत की खोज की कमियों के विरुद्ध उसकी उपलब्धियों का  भी संकेत करते है।
    इस प्रकार कहा जा सकता है कि नेहरु जी द्वारा रचित भारत की खोज एक खास मकसद से लिखी गयी किताब थी जिसमें भारत को एक राष्ट्र के रूप में परिभाषित करने का एक प्रसंशनीय प्रयास किया गया है।  नेहरु जी जब इस किताब की रचना कर रहे थे उस समय देश में काफी उथल पुथल की स्थिति थी, आजादी की जंग जारी थी सो उस समय देश को एक राष्ट्र के रूप में परिभाषित करना काफी आवश्यक था।  नेहरु जी एक राष्ट्र के तौर पर भारत को परिभाषित करना चाहते थे और इस कार्य के लिये उन्हें इतिहास में जाने की आवश्यकता महसूस हुई।  भारत का इतिहास पहले भी लिखा ज चुका था पर वह योरोपीय नजरिये से लिखा हुआ इतिहास था।  नेहरु जी एक ऐसे भारत के अतीत को देश के सामने प्रस्तुत करना चाहते थे जो योरोपीय रंग से मुक्त हो।  नेहरु के इस इतिहास के लेखन को भले ही रोमानी या लोकप्रिय कह कर ख़ारिज कर दिया जाये परन्तु नेहरु एक ऐसे नेता थे जो आम आदमी के समर्थक थे, जो भारतीय झंडे में चरखे की जगह अशोक चक्र स्थान देना चाहते थे।  अनेकता में एकता उनका मूल मंत्र रहा। भारत की खोज नेहरु जी के वैज्ञानिक, दार्शनिक दृष्टिकोण का परिचायक तो है ही साथ ही साथ आधुनिक सोच का प्रत्यक्ष प्रमाण भी है।

-    सुस्मित सौरभ
संदर्भ:-  
१.    भारत की खोज- पंडित जवाहर लाल नेहरु
२.    भारत की खोज विकिपीडिया
३.    जानकीपुल ब्लॉग
४.    अपनी हिन्दी ब्लॉग
५.    अमर उजाला ब्लॉग

गुरुवार, 19 फ़रवरी 2015


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सोमवार, 1 दिसंबर 2014



सूर की कृष्ण-कथा का पौराणिक आधार
सगुण भक्ति के आराध्य देवी देवताओं में लीलाधर भगवान कृष्ण का स्थान सर्वोपरि रहा है. भगवान कृष्ण का वर्णन भारतीय पुराण और इतिहास में सर्वाधिक रूप में मिलता है. महाभारत, गीता, पुराण आदि ग्रंथ कृष्ण कथा के पौराणिक साक्ष्य रहे हैं जिनके आधार पर परवर्ती रचनाकारों ने अपने कालानुसार यथासंभव कृष्ण-कथा  की पुनर्रचना की. सूरदास जी द्वारा रचित ‘सूरसागर’ कृष्ण-कथा का एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है  जिसमें भागवत पुराण के द्वादश स्कंधों को उपजीव्य मानकर कृष्णभक्ति के चरित नायक कृष्ण की समस्त लीलाओं का वर्णन प्रभावस्तुति  के रूप में किया गया है.
महाभारत में  कृष्ण एक सामान्य मानव के रुप में सात्वत यदुवंशीय क्षत्रिय के रूप में चित्रित हुए हैं . यह कृष्ण चरित के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डालने वाला एक प्रमुख ग्रंथ है अगर गीता के आधार पर कृष्ण के चरित्र का आकलन करें तो उनका दार्शनिक रूप पूर्ण रूप से उद्घाटित होता है जो अर्जुन को गीता का उपदेश देते हैं, वहीं भारतीय पुराणग्रंथों में श्रीकृष्ण का अध्यात्मिक रूप प्रमुखता से व्यंजित होता है जहाँ अन्य अवतारों को अंश अवतार और उन्हें पूर्णावतार कहा गया है. भागवतपुराण, हरिवंशपुराण, विष्णुपुराण, पद्मपुराण, ब्रह्मपुराण, अग्निपुराण और ब्रह्मवैवर्तपुराण में कृष्ण का महिमामंडन विस्तारपूर्वक हुआ है और देवाधिदेव को लोकरंजक और लोकरक्षक के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है. पुराणों में भगवान कृष्ण के  रूप माने गये हैं  -  ऐश्वर्यमय कृष्ण और माधुर्यमय कृष्ण.  ऐश्वर्य रूप के अंतर्गत उनकी लोकरक्षक लीलायें हैं जिनमें वे राक्षसों का संहार कर लोगों की रक्षा करते हैं वहीं लोकरंजक रूप कृष्ण के माधुर्य भावना का परिचायक है जिसमें वो अपने भक्तों के अनुरंजन के लिये विभिन्न लीलायें करते हैं. पुराणों में  कृष्ण के शैशव, विद्याध्ययन, विवाह, संतति आदि पारिवारिक कृत्यों का वर्णन मिलता है जो महाभारत में अंकित नहीं है. इनमें वर्णित कृष्ण महाभारतीय कृष्ण और द्वारिकाधीश कृष्ण से परे व्रजवासी लोकपरायण कृष्ण रहे हैं.  
सूर वर्णित कृष्ण कथा किसी न किसी रूप में पुराणों से संबद्ध है और सूरदास जी ने अपने प्रतिपाद्य के अनुकूल स्रोत ग्रहण कर अपनी कथाओं को मौलिक रूप में प्रस्तुत किया है. ‘भागवत’ के सामान ही सूर के कृष्ण देवकी के गर्भ से अपने पूर्ण ऐश्वर्य के साथ प्रकट होते है और शंकर और ब्रह्मा द्वारा उनकी स्तुति भी की जाती है परन्तु उनमें अपने माता पिता को अपने अलौकिक रूप से अधिक देर तक चकित करने का आग्रह नहीं है. यही नहीं, सूर के कृष्ण में जो कार्य-संपादन की सहजता और कोमलता देखने को मिलती है वह किसी भी पौराणिक कृष्ण में नहीं मिलती. सूर के कृष्ण कथा का अध्ययन करने के पश्चात हमें यह ज्ञात होता है कि पुराणों में कई ऐसे प्रसंग हैं जिनका सीधा सम्बन्ध अगर कृष्ण-राधा से नहीं हैं तो उन्हें सूरदास जी ने अपनी कृष्ण कथा के क्रम  में छोड़ दिया है तथा कहीं – कहीं कुछ ऐसे भी संदर्भ भी उपस्थित हुए हैं जिनकी पुराणों में कोई चर्चा नहीं है परन्तु कृष्ण  राधा का शाश्वत सम्बन्ध दिखने के लिये उन सन्दर्भों का समावेश इस कथा में किया गया है. कृष्ण प्रिय राधा की  चर्चा कृष्णकथा प्रमुख पुराण ‘भागवत’ में कहीं भी नहीं मिलती भले ही ब्रह्मवैवर्त पुराण में रास के बीच राधा प्रमुख रूप में दिखाई पड़ी है, परन्तु सूर ने  राधा को कृष्ण की सहचरी प्रिया के रूप में अपनी कथा में प्रमुखता से स्थान दिया है और अपनी लौकिक दृष्टि से उनके विवाह प्रसंग का समावेश साभिप्राय किया है. कृष्ण की प्राणेश्वरी राधा को स्वकीया रूप प्रदान करने का मौलिक अवदान सूर का ही है. चीरहरण और रासलीला जैसी कई मौलिक उद्भावनाएँ सूर ने अपनी कृष्ण कथा में  प्रस्तुत की  है. सूर की दृष्टि कृष्ण के लोकरंजक रूप पर ही अधिक रही है और लीला वर्णन मे भाव पक्ष की प्रधानता रही है. भाव चित्रण के संदर्भ में उनक वात्सल्य भाव सर्वश्रेष्ठ है   .
सूर कृत ‘सूरसागर’ का ‘भ्रमरगीत’ प्रसंग एक प्रमुख विरह ग्रंथ है जिसकी कथा मुख्य रूप से ‘भागवत’ पुराण से उद्धृत है. भ्रमरगीत में  गोपियों की मार्मिक विरह-भावना, सगुण-निर्गुण विवेचन, ज्ञान और भक्ति का तारतम्य तथा भक्ति की सीमाओं का जैसा मनोहारी चित्रण हुआ है वह सूरदास की भक्ति के दार्शनिक और भावुक दोनों रूप सामने लाने में समर्थ है.  सूर वर्णित राधा- कृष्ण के मिलन का प्रसंग ब्रह्मवैवर्त पुराण के प्रसंग से भिन्न है .वे एक दूसरे से कुरुक्षेत्र में मिलते हैं और मिलन के पश्चात अपने अपने स्थान गोकुल और द्वारिका के लिये अलग अलग प्रस्थान करते हैं. सूर के राधाकृष्ण का यह मिलन बहुत ही मार्मिक बन पड़ा है , भले ही इसमें पौराणिक स्वरूप के सूक्ष्म संस्कार दिखाई पड़ते हों परन्तु यह अपने आप में पूर्ण रूप से मौलिक और अभूतपूर्व है.
इस प्रकार सूरदास जी रचित कृष्ण–कथा के आधार उपरोक्त वर्णित पुराण ग्रंथ बने हैं जिनमें  मौलिकता का पुट उनके कृष्णचरित को सभी दृष्टियों से सर्वोपरि और विशिष्ट बनाता है. भाषा की सजीवता के लिये मुहावरों और लोकोक्तियों का पुट उनकी कथा के वर्णन को अभूतपूर्व सौन्दर्य की अनुभूति प्रदान करते है.
                                                                  
                                                                             सुस्मित सौरभ
                                                                             शोध छात्र : मगध विश्वविद्यालय