बुधवार, 18 दिसंबर 2013



                                                                                                                               शोध निबंध
                                                 मिथक और  कुँवर नारायण 
                               
मिथक: अर्थ और स्वरूप     
        हिन्दी साहित्य में ‘मिथक’ के प्रयोग के परंपरा की शुरुआत आधुनिक काल से मानी जाती है.आधुनिक काल के प्रारंभ से ही रचनाकारों ने मिथक को महत्व देते हुए मिथक आधारित  रचनाओं का नयी दृष्टि से सृजन करना प्रारम्भ कर दिया था .हिन्दी  साहित्य में मिथक शब्द का प्रयोग नितांत अर्वाचीन होते हुए भी एक दीर्घ पौराणिक विस्तृत परंपरा का परिचायक है. विद्वानों ने ऐसा माना है कि मिथक का जन्म प्रकृति में मानव के उद्भव  के साथ ही हुआ है.मिथक उतना ही प्राचीन है जितनी स्वयं मानवजाति. मानव जाति के आरम्भ काल में जब मानव में सृष्टि को देखने तथा समझने की दृष्टि उत्पन्न हुई, इन कथाओं ने जन्म लेना आरम्भ कर दिया.प्रकृति के विभिन्न तत्वों जैसे सूर्य ,चंद्र ,नभ,धरा,पर्वत ,सागर आदि  जीवन  की  विभिन्न घटनाएँ  जैसे मृत्यु ,जन्म ,महामारी आदि , प्रकृति की विभिन्न घटनाएँ जैसे भूकंप ,जलप्लावन आदि मानस की अवधारणाओं तथा तत्सम्बन्धी हर्ष,भय, विषाद ,आश्चर्य आदि भावों को मिथक के द्वारा ही अभिव्यक्ति दी गई है.
        वैसे हिन्दी में मिथकों को परिभाषित करने की  प्रवृति बहुत कम उभरी .इसका एक मुख्य कारण था भारतीय पुराणों को पुनरुथानवादी ग्रंथों  के रूप में न देखकर उसमें व्याप्त सृष्टि ,लय,प्रकृति,मनुष्य,देव ,दानव जैसे तमाम दूसरे परिवर्तनों की कथाओं में अंतर्निहित कालातिक्रामी प्रवृतियों और परिवर्तनों की  कथाओं और परिस्थितिओं का मूल्यांकन किया गया.हिन्दी में पुराकथाओं के प्राक प्रवाह में विद्यमान समकालीन दर्शन को को मिथक कहा गया.ये पुराकथाएँ केवल ऊपरी घटनाक्रमों तक अवरुद्ध नहीं थीं बल्कि इनका प्रतीकात्मक स्वरूप था. इनके प्राक्तन बिम्बों और प्रतीकों से नव-नवोद्भव अर्थ तरंगें निरंतर उठती रहती थीं जिनका  प्रयोग ६० वें-७० वें दशक के दृष्टि संपन्न नए कवियों ने किया .जब इन कवियों ने समकालीन मन:स्थिति और मूल्यवादी परिस्थितिओं के हल  के लिए पुरा-प्रसंगों और पुराण कथाओं का सर्जनात्मक उपयोग करना शुरू किया  तब उनके सृजनात्मक नव प्रयासों को मिथक कहा गया.ये मिथक टूटते विश्वासों,खंडित होते सामाजिक मूल्यों और मानवीयता के क्षरण को रोकने में सार्थक साबित हुए .हिन्दी साहित्य में सम्प्रति वैदिक एवं पौराणिक आख्यानों के लिए मिथक शब्द का प्रयोग अधिक प्रचलित हो चुका है.
          काव्य से मिथक का घनिष्ठ सम्बन्ध रहा है जो भारतवर्ष में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी माना जाता है.  मिथक शब्द अंग्रेज़ी के ‘मिथ’ का हिंदी रूप है तथा ऐसा माना जाता है कि यह शब्द हिंदी जगत को ‘आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी’ से मिला .मिथ मूलतः ग्रीक भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है –‘वाणी का विषय’ . वाणी का विषय से तात्पर्य है –एक कहानी ,एक आख्यान जो प्राचीन काल में सत्य माने जाते थे और कुछ रहस्यमय अर्थ देते थे.मिथ शब्द के कुछ कोशगत अर्थ भी हैं –कोई पुरानी कहानी अथवा लोक विश्वास ,किसी जाति का आख्यान धार्मिक विश्वासों एवं प्रकृति के रहस्यों के विश्लेषण से युक्त देवताओं तथा वीर पुरुषों की पारंपरिक गाथा ,कथन ,वृत्त, किवदंती, परंपरागत कथा आदि.यदि इन सब अर्थों की मीमांसा की जाये तो एक बात सब अर्थों के मूल में किसी न किसी सीमा तक लक्षित है –‘सबके मूल में कथा तत्व का होना’ . 
        मिथक को दार्शनिक ,तत्व्शास्त्री ,समाजशास्त्री ,भाषाविज्ञानी,इतिहासकार और कोशकार सभी ने अपने अपने ढंग से परिभाषित किया. अरस्तु के यहाँ मिथ शब्द का का प्रयोग कथाबंध या गल्प कथा के रूप में मिलता है.  रिचर्ड चेज का कहना है –‘मिथक ही साहित्य है’.वे कहते हैं कि साहित्य का मुख्य रूप मिथकात्मक ही होता है. 
   बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में प्रेसकाट ने अपनी पुस्तक ‘पोएट्री एंड मिथ’ में कविता और मिथक के व्यापक विमर्श प्रस्तुत किये. ‘एनसाइक्लोपिडिया आव रिलिजन एंड एन्थ्रिक्स’ में ई.ए.गार्डनर ने मिथक पर विचार करते हुए कहा कि मिथक प्रायः प्रत्यक्षतः या परोक्षतः कथा रूप में होता है.इस प्रकार मिथक कथा ,नीति-कथा या अन्योक्ति से उसी प्रकार भिन्न है जिस प्रकार कहानी या रूपाख्यान से.
    ‘एनसाइक्लोपिडिया आव सोसल साइंसेज’ में कहा गया गया है कि मिथक लोक साहित्य के सामान जातीय आकांक्षाओं ,आदर्शों का एक सुस्पष्ट  माध्यम है. प्रसिद्ध विद्वान् मैक्समूलर ने मिथक को केवल भाषा का रोग ,मैलेडी आव लैंग्वेज मात्र माना है.भाषा जब असमर्थता के कारण एक के स्थान पर ,साम्य या भ्रान्ति के कारण, दूसरे शब्द को ग्रहण कर लेती है और अर्थ विषयक परिवर्तन भी पैदा कर देती है तब मिथक का जन्म होता है.
   विद्वान् अर्न्स्ट कैसिरार मिथक का क्षेत्र इतना व्यापक मानते है कि मानव जीवन का कोई भी क्रिया-कलाप ऐसा नहीं है जो मिथकीय न हो.
श्री हेनरी जे. मरे के अनुसार मिथक किसी अनुमानित या विलक्षण घटना का बोधात्मक तथा नाटकीय प्रतिवस्तु-स्थापना है.वस्तुतः मिथक के स्वरूप को लेकर अनेक विचार और मत मिलते हैं .मिथक कोरी कल्पना न होकर कल्पना के खोल में अपने समय का एक सामाजिक यथार्थ होता है .
मिथकीय कल्पना के सम्बन्ध में कहा जा सकता है की मिथक का कथ्य आज कल्पना का विषय बन चुका है तथा सत्रहवीं –अठारहवीं शताब्दी में कपोल-कल्पना समझा जाने वाला मिथ मनोविज्ञान और विज्ञान के प्रगति के साथ अपना अर्थ बदलने लगा है.प्रारंभ में तो मिथक अध्येताओं ने मिथक के धार्मिक पक्ष,देवी-देवताओं की कथा को ही महत्व दिया परन्तु धीरे-धीरे इसके मनोवैज्ञानिक अभिप्राय और सांस्कृतिक पक्ष को प्रधानता मिलने लगी.

हिंदी और मिथक
               हिंदी में मिथकों को मोटे तौर पर कम ही परिभाषित किया गया है जिसका कारण था भारतीय पुराणों को पुनरुत्थानवादी ग्रंथों के रूप में न देखा जाना.हिंदी में पुरा-कथाओं के प्राक-प्रवाह में विद्यमान समकालीन दर्शन को मिथक कहा गया .सबसे पहले आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने मिथक-मीमांसा प्रस्तुत की .उन्होंने कहा की मिथक तत्व उस सामूहिक मानव की भाव-निर्मात्री शक्ति की अभिव्यक्ति है जिसे कुछ मनोविज्ञानी आर्किताइल इमेज(आद्य्बिम्ब) कहते हैं.
डॉ.उषापुरी विद्या-वाचस्पति ने अपने ‘भारतीय मिथक कोश’  में इस शब्द को संस्कृत के ‘मिथ’ शब्द से कर्त्तावाचक ‘क’ प्रत्यय लगाकर व्युत्पन्न माना है.संस्कृत में मिथ शब्द का प्रयोग प्रत्यक्ष ज्ञान के लिए भी होता है और दो तत्वों के परस्पर मेल के लिए भी.मिथक के सन्दर्भ में दोनों अर्थ  जुड़े हुए प्रतीत होते हैं.
 डॉ नगेन्द्र मिथक शब्द की उत्पत्ति संस्कृत से न मान कर अंग्रेजी से स्वीकार करते हैं . .उनका मानना है कि मिथक अंग्रेजी के मिथ शब्द का हिन्दी पर्याय है और अंग्रेजी का मिथ शब्द यूनानी भाषा के शब्द माइथामस से व्युत्पन्न है जिसका अर्थ  है आप्तवचन या अतर्क्य कथन जिसका प्रयोग अरस्तु ने फ्रेबिल (कथा-विधान )के रूप में किया है. १०     
हिंदी समीक्षकों ने अपने-अपने मतों के प्रस्तुतीकरण के अतिरिक्त मिथक को कुछ नयी संज्ञाएँ भी दीं .हिन्दी में मिथ के लिए कल्पकथा११, पुराकथा१२ , धर्मगाथा१३ , पुराख्यान तत्व १४  आदि शब्दों का प्रयोग भी हुआ है .डॉ.रमेश कुंतल मेघ ने अपनी पुस्तक में मिथ शब्द का समानार्थी मिथक ही प्रयुक्त किया है १५  और आज ‘मिथक’ शब्द ही एक प्रकार से रूढ़ हो गया है.
         मिथक के लिए डॉ. नगेन्द्र तथा कवि बच्चन ने ‘दन्तकथा’,डॉ.रामअवध द्विवेदी ने ‘पुरावृत्त’ ,डॉ.सत्येन्द्र ने ‘धर्मगाथा’ ,कवि  कुंवरनारायण ने ‘पुराकथा’ ,डॉ. लक्ष्मीनारायण शर्मा ने ‘पुराख्यान’ और आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने ‘मिथक’ शब्द का प्रयोग किया जो आज हिंदी साहित्य में सर्वाधिक प्रचलित है. आचार्य द्विवेदी ने मिथक शब्द का प्रयोग अंग्रेजी के ‘मिथ’ के आधार पर किया है और ‘क’ प्रत्यय जोड़कर उसे हिंदी बना दिया है .हालाँकि अंग्रेजी के मिथ और संस्कृत के मिथ में पर्याप्त अंतर है .अंग्रेजी का मिथक कोरी कल्पना पर आधारित माना  जाता है जबकि  संस्कृत का मिथक अलौकिकता का पुट लिए लोकानुभूति बताने को दर्शाता है .१६

नयी कविता और मिथक का सन्दर्भ
            हिंदी में मिथक आधुनिक युग की देन हैं .हिंदी साहित्य के आधुनिक काल के प्रारंभ से ही मिथकों के महत्व वाली रचनाओं का सृजन आरम्भ हो चुका था . हिन्दू जाति बहुल देश के बौद्धिक निर्माण में पुराणों का बहुत बड़ा हाथ रहा है. जाने अनजाने यहां की एक बहुत बड़ी जनता पौराणिक देवताओं के चरित्रों और आदर्शों से प्रभावित और प्रेरित होती रही है. चेतना के निम्नतम और गहरे स्तर पर भी पौराणिक मिथकों का असर रहा है. इस दृष्टि से यह एक सहज सत्य है कि नये कवियों ने पौराणिक कथाओं और विश्वासों को युगबोध के स्तर पर पुनः नये ढंग से दुहरा कर या अपनी कविता में सजाकर  अपनी युगानुकूल प्रवृत्ति को एक चमक प्रदान करने के लिए पुराण का सहारा लिया . भक्तियुग में राधा-कृष्ण, राम-सीता, शिव-पार्वती आदि का सहारा भक्तों ने अपनी भावनाओं के लिए लिया था. रीतिकाल में भी रति और राग की विभिन्न क्रीड़ाओं को अभिव्यंजित करने के लिए राधा-कृष्ण का उपयोग कवियों ने अपने ढंग से किया. परिस्थिति को पुराण की दृष्टि से देखने की आदत कवियों में पुराकाल से ही चली आ रही है. स्वातंत्र्योत्तर काल में पौराणिक कथाओं के प्रयोग का स्वरूप इसलिए अधिक विचारणीय है कि आधुनिक काल में आधुनिकता न केवल समय की संज्ञा है , अपितु इससे विचारदर्शन का बोध होता है. स्वातंत्र्योत्तर आधुनिक मनुष्य के सोचने-समझने का तरीका बदल रहा है . रामायण, महाभारत, उपनिषद, पुराण की अनेक कथाएँ आधुनिक युग में आकर बौद्धिक आख्याओं से सम्बन्धित हो गयी . इसी बौद्धिक व्याख्या के रूप में नये कवियों ने भी पौराणिकता को ग्रहण किया.नयी कविता मोहभंग और यथार्थ के नवीनतम तीखे बोध तथा अंतर्राष्ट्रीय नवीन मूल्य चेतना की कविता है और इतिहास इसकी पृष्ठभूमि में अपना चेहरा बहुत कुछ बदल चुका है, तथापि नये कवियों ने पौराणिकता का प्रयोग अपने ढंग से किया है.इस प्रसंग के विस्तार में न जाते हुए मैथिलीशरण गुप्त रचित साकेत ,निराला रचित राम की शक्तिपूजा और प्रसाद की कामायनी का विशेष स्मरण कराया जा सकता है . हिन्दी के स्वातंत्र्योत्तर खंडकाव्यों की कथावस्तु में पौराणिक मिथकों को आधार बनाकर उसे नवीन अर्थवत्ता प्रदान करते हुए आधुनिक जीवन की किसी न किसी समस्या का समाधान प्रस्तुत करने का प्रयास किया है. बदलते हुए सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक मूल्यों का चित्रण भी इन काव्यों में विद्यमान है. धर्मवीर भारती के अंधायुग’, ‘महाप्रस्थान’, ‘कनुप्रियातथाशबरी’, नरेश मेहता का संशय की एक रात’, कुँवर नारायण का आत्मजयी तथा  ‘वाजश्रवा के बहाने’ , नरेन्द्र शर्मा का द्रौपदी’, जगदीश चन्द्र का शम्बूक’, नागार्जुन काभस्मांकुरएवं दिनकर के रश्मिरथीऔर उर्वशीजैसे खंडकाव्य इसके प्रमुख उदहारण हैं.
कुँवर नारायण की मिथकीय चेतना 
        हिन्दी साहित्य में कुँवर नारायण एक ऐसे नाम हैं जिनका समकालीन साहित्य में एक विशिष्ट स्थान हैं. कुँवर नारायण को अपनी रचनाशीलता में  ‘इतिहास और मिथक के जरिये वर्तमान’ को देखने के लिए जाना जाता है।    नई कविता आंदोलन के सशक्त हस्ताक्षर कुँवर नारायण अज्ञेय द्वारा संपादित ‘तीसरा सप्तक’(1959) के प्रमुख कवियों में रहे हैं. कुँवर नारायण का रचना संसार इतना व्यापक एवं जटिल है कि उसको कोई एक नाम देना सम्भव नहीं. यद्यपि कुँवर नारायण की मूल विधा कविता रही है पर इसके अलावा उन्होंने कहानीलेख व समीक्षाओं के साथ-साथ सिनेमारंगमंच एवं अन्य कलाओं पर भी बखूबी लेखनी चलायी है. इसके चलते जहाँ उनके लेखन में सहज संप्रेषणीयता आई वहीं वे प्रयोगधर्मी भी बने रहे. उनकी कविताओं-कहानियों का कई भारतीय तथा विदेशी भाषाओं में अनुवाद भी हो चुका है. हिन्दी के प्रख्यात कवि कुँवर नारायण का जन्म 19 सितंबर 1927 को हुआ था. उन्होने इंटर तक की पढ़ाई विज्ञान विषय से की लेकिन आगे चल कर वे साहित्य के विद्यार्थी बने और 1959 में लखनऊ विश्वविद्यालय से अंग्रेज़ी साहित्य में एम.ए. किया. एम०एम० करने के ठीक पाँच वर्ष बाद वर्ष 1956 में 29 वर्ष की आयु में उनका प्रथम काव्य संग्रह  ‘चक्रव्यूह’ नाम से प्रकाशित हुआ.अज्ञेय जी ने वर्ष 1959  में उनकी कविताओं को केदारनाथ सिंह, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना और विजयदेव नारायण साही के साथ तीसरा सप्तकमें शामिल किया.1965 में आत्मजयीजैसे प्रबंध काव्य के प्रकाशन के साथ ही कुँवर नारायण ने असीम संभावनाओं वाले कवि के रूप में पहचान बना ली। फिर तो ‘आकारों के आसपास’ (कहानी संग्रह-1979 ), ‘परिवेश : हम-तुम’‘अपने सामने’‘कोई दूसरा नहीं’‘इन दिनों’‘आज और आज से पहले’ (समीक्षा), मेरे साक्षात्कार’,’हाशिये का गवाह’  और हाल ही में प्रकाशित ‘वाजश्रवा के बहाने’ सहित उनकी तमाम कृतियाँ आती रही.
         मिथक और समकालीनता को एक सिक्के के दो पहलू मानते हुए  कुँवर नारायण जी ने  अपनी कविताओं में वेदों, पुराणों व अन्य धर्मग्रंथों से उद्धरण दिया है.कुँवर नारायण जी ने प्राचीन कथाओं  के माध्यम से जो भी काव्य सृष्टि की ,वह अप्रतिम है.उनके काव्य में इतिहास और पुराण से सम्बंधित वृतांतों को लेकर जो भी रचा गया उसकी उपयोगिता वर्तमान परिपेक्ष्य को लेकर ही सृजित है .कवि अपने विचारों को व्यक्त करने के लिए पुराण वर्णित कथाओं को खोज लाता है,प्राचीन परम्पराओं और समूहगत भावनाओं से तादात्म्य स्थापित करता है और अपने विचारों को व्यक्त करने के लिए उसकी कल्पना स्वमेव ही मिथकीय माध्यम अपना लेती है .मिथक हमारे धर्म, दर्शन और संस्कृति की नई व्याख्या करके उसे सर्वग्राह्य बनाता है.यदि नवीनता के नाम पर पुरातनता को अग्राह्य मान लिया जाये तो नवीनता का कोई महत्त्व नहीं रह जाता .कवि अपने कथ्य के अनुरूप ही मिथक को  अपनाता है. कवि की अनुभूति का निजी स्वर इतिहास के पटल पर विकसित होकर अपने अंतर्विरोधों के साथ जब राष्ट्रीय और सामाजिक आयामों में ढल जाता है तब जाकर काव्य में मिथकीय चेतना जन्म लेती है .मिथकीय स्रोतों से कवि नई व्याख्याओं का अन्वयन करता है तथा कवि मन के चिरंतन भाव मार्मिकता के साथ मिथक के रूप में प्रकट होते हैं .कवि के भावों को सशक्त और समर्थ रूप देने में मिथक की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है .कुँवर नारायण जी के साहित्य का परिवेश एकांगी नहीं  है . कवि का आत्मचिंतन अव्यक्त परिवेश को भी साकार कर देता है .नचिकेता हो या वाजश्रवा या फिर यम कवि इनसे अपना मंतव्य सिद्ध कर ही लेता है .   
 आत्मजयी    
  ‘आत्मजयी’ कुँवर नारायण जी द्वारा रचित प्रबंधकाव्य है जो ‘कठोपनिषद’ पर आधारित . १९६५  में प्रकाशित इस लघु महाकाव्य  में  मृत्यु के प्रति उनकी दृष्टि उजागर हुई है. मृत्युजिसका सामना हर व्यक्ति को अपने जीवन में करना होता है. उन्होंने अपने प्रबंध आत्मजयीमें मृत्यु संबंधी शाश्वत समस्या को कठोपनिषद का माध्यम बनाकर अद्भुत व्याख्या के साथ हमारे सामने रखा. २८ शीर्षकों में बंटे इस प्रबंध काव्य में कवि ने मूल्यों की सैद्धान्तिक विवेचना और दार्शनिक व्याख्या की है. कवि ने अपने प्रसंगों को सांस्कृतिक एवं दार्शनिक स्तर पर प्रस्तुत करते हुए लिखा है ---      
 “आत्मजयी में उठाई गई समस्या मुख्यतः एक विचारशील व्यक्ति की समस्या है,केवल ऐसे प्राणी की समस्या नहीं जो दैनिक आवश्यकताओं के आगे नहीं सोचता या सोच पाता.कथानक का नायक नचिकेता मात्र सुखों को अस्वीकार करता है :तात्कालिक आवश्यकताओं की पूर्ति ही उसके लिए पर्याप्त नहीं .उसके अंदर वह वृहत्तर जिज्ञासा है जिसके लिए केवल सुखी जीना काफी नहीं,सार्थक जीना जरुरी है .यह जिज्ञासा ही उसे साधारण प्राणी से विशिष्ट उन मनुष्यों की कोटि में रखती है जिन्होंने सत्य की खोज में अपने हित को गौण माना,कायिक जीवन को स्वप्न समझा और जिन्होंने ऐन्द्रिय सुखों के आधार पर ही जीवन से समझौता नहीं किया बल्कि उस चरम लक्ष्य के लिए अपना जीवन अर्पित कर दिया जो उन्हें पाने के योग्य लगा .”१७
 “जीवन केवल सुख की साधना नहीं 
  वह दिव्य शक्ति
  अनवरत खोज                                       
  अनथक प्रयास
   वह मुक्ति-बोध
   उसको केवल पशु-सा तन से बाँधना नहीं !” १८                                                                                                                                           
             इस खंडकाव्य में  नचिकेता अपने पिता की आज्ञा, ‘मृत्यवे त्वा ददामि अर्थात मैं तुम्हें मृत्यु को देता हूँ, को शिरोधार्य करके यम के द्वार पर चला जाता है, जहाँ वह तीन दिन तक भूखा-प्यासा रहकर यमराज के घर लौटने की प्रतीक्षा करता है. उसकी इस साधना से प्रसन्न होकर यमराज उसे तीन वरदान माँगने की अनुमति देते हैं. नचिकेता इनमें से पहला वरदान यह माँगता है कि उसके पिता वाजश्रवा का क्रोध समाप्त हो जाए.आत्मजयी में उठायी गई समस्या एक विचारशील व्यक्ति की समस्या है , केवल ऐसे प्राणी की समस्या नहीं जो दैनिक  आवश्यकताओं के आगे नहीं सोच पाता .कुँवर नारायण की रचनाओं में निराशा ,विसंगतियों,घुटन और बोझिल स्थितियों के विरुद्ध मानवीय बोध की संघर्ष चेतना की अभिव्यक्ति मिलती है .आज भौतिकवादी व्यवस्था से प्रभावित मानव का आत्मपरक सार्थकता पर विचार किया गया है .आज भौतिकवादी व्यवस्था से प्रभावित मानव का आत्मपरक दृष्टिकोण स्तर संचेतना को खाए जा रहा है.जीवन के उदात्त भाव और मानवीय मूल्य लुप्त हो रहे हैं.कुँवर नारायण जी ने इसी सन्दर्भ में लिखा है –
“ सम्पूर्ण बोध
हो चुका काल को अर्पित
जीवन में वापस आया
वह शोधित प्रसाद
मैं
सभी दिशाओं में प्रतिक्षण
उत्पन्न
विभाषित
आरम्भित
अनुसृष्टि नहीं –स्रष्टा स्वरूप
लाखों निर्माणों में गलता  ढलता
कोई अव्यय भविष्य ................
मैं जाग्रत हूँ-”१९   
कवि चिरंतन सत्य की रक्षा करने के लिए जाग्रत रहता है.उसे समाज के विघटित मूल्यों को देखकर पीड़ा होती है. नचिकेता के अन्दर एक वृहतर जिज्ञासा है जिसके लिए केवल सुखी जीना काफी नहीं,सार्थक जीना जरुरी है. आत्मजयी आस्था की कहानी का साथ साथ व्यक्ति के विजय पर्व की कहानी है जिसका प्रस्थान बिंदु है आत्मजयी. नचिकेता निरंतर एक सृजनधर्मी जीवन लोक की तलाश में रहता है .
 आत्मजयी में पीढ़ियों के संघर्ष के द्वारा युगीन जीवन के चित्रण का एक सार्थक प्रयास किया गया है. पुरानी पीढ़ी के प्रतीक  नचिकेता के पिता  वाजश्रवा उसके व्यक्तित्व को विकसित नही होने देना चाहते . नचिकेता विपरीत परिस्थतियों के विरोध में ‘अधिकार सामान होना चाहिए’ की मांग करता है .  कवि  कुँवर नारायण जी ने आत्मजयी को  पौराणिक कथावृत्त का सहारा लेकर आधुनिक सन्दर्भों में देखने का प्रयास किया है तथा एक नया वैचारिक आलोक देकर इसकी महत्ता को और बढ़ा दिया है जो उनकी मिथकीय दृष्टि का परिचायक है.
 “असहमति को अवसर दो .सहिष्णुता को अवचारण दो
कि बुद्धि सिर ऊँचा रख सके-
उसे हताश मत करो काइयाँ स्वार्थों से हराकर .
अविनय को स्थापित मत करो
उपेक्षा से खिन्न न हो जाए कहीं
मनुष्य की साहसिकता.”२०  

     ‘आत्मजयी’ में चिरंतन जीवन मूल्यों का संधानहै . कवि ने कहा है –“नचिकेता की चिंता अमर जीवन की चिंता है.अमर जीवन से तात्पर्य उन अमर जीवन-मूल्यों से है,जो व्यक्ति जगत का अतिक्रमण करके सार्वकालिक एवं सार्वजनीन बन जाते हैं.”२१  
  वाजश्रवा के बहाने
  कुँवर नारायण जी द्वारा रचित  खण्ड-काव्य  ‘वाजश्रवा के बहाने’ अपने समकालीनों और परवर्ती रचनाकारों के काव्य-संग्रहों के बीच एक अलग और विशिष्ट स्वाद देने वाला है जिसे प्रौढ़ विचारशील मन से ही महसूस किया जा सकता है.इसके पहले भाग ‘नचिकेता की वापसी’ में जीवनके आह्वान और उदय को देखा गया है तो दूसरे भाग ‘वाजश्रवा के बहाने’ में एक विदग्ध जीवन का सायंकाल है.  वाजश्रवा के बहाने , में उन्होंने पिता वाजश्रवा के मन में जो उद्वेलन चलता रहा उसे अत्यधिक सात्विक शब्दावली में काव्यबद्ध किया है.
“कन्धों पर लबादा डाले
तख़्त पर बैठा वह वयोवृद्ध
एक पराजित सम्राट भी हो सकता है
और एक विरक्त संन्यासी भी!
एक कृतार्थ पिता भी हो सकता है वही
और एक पुत्र की उदासी भी .”२२  
 इस कृति की विरल विशेषता यह है कि अमूर्तको एक अत्यधिक सूक्ष्म संवेदनात्मक शब्दावली देकर नई उत्साह परख जिजीविषा को वाणी दी है. जहाँ एक ओर आत्मजयी में कुँवरनारायण जी ने मृत्यु जैसे विषय का निर्वचन किया है, वहीं इसके ठीक विपरीत वाजश्रवा के बहानेकृति में अपनी विधायक संवेदना के साथ जीवन के आलोक को रेखांकित किया है.
“मुझे दया से नफरत है .
दे सको तो बराबर की मैत्री दो ,
पर अपनी दया दे कर
दयनीय न बनाओ मुझे  .
सम्मानित जीवन दो,
या फिर एक सम्मानित मृत्यु
मरने दो मुझे .....”२३   
 कुँवर नारायण के इस संग्रह में भी मृत्यु का गहरा बोध है. भले ही इसमें जीवन की ओर से मृत्यु को देखने की कोशिश है. यदि मृत्यु न होती तो जीवन को इस प्रकार देखने की आकांक्षा भी न होती. ‘मृत्यु ही जीवन को अर्थ देती है और निरर्थक में भी अर्थ भरती है' यह कथन असंगत नहीं है. मृत्यु है इसीलिए जिजीविषा भी है, जिजीविषा है इसीलिए सम्भावना भी.अंत में यही निष्कर्ष निकलत है कि जहाँ जीवन को लाँघ कर आकाश मार्ग से पहुंचा जा सकता है वहीं शायद जीवन को  जीते हुए थल मार्ग से .
 “दांतों और पंजों के
निशान खोजते हुए नहीं
केवल कुछ अलौकिक ध्वनियों के सहारे
आकार ले
यह निश्चय
कि जहाँ पहुँचा जा सकता है
आकाश-मार्ग से  - जीवन को लाँघकर
वहीं पहुँचा जा सकता है – थल मार्ग से भी
जीवन को जीते हुए” २४  

वाजश्रवा  के मन में आत्मिक उहापोह कम हैं ,वैदिक जीवन-दृष्टि की लौकिकता प्रमुख है.आज की भौतिकता में भी उसकी एक झलक पहचानी जा सकती है.साथ ही वाजश्रवा के मन में गहरा विक्षोभ है अपने उस अशुभ क्रोध को लेकर जिसके कारण उसका जीवन यज्ञ बाधित हुआ .
        “पुत्र की वापसी एक अमूल्य अवसर है कि वाजश्रवा अपनी भूल-चूकों को सुधार ले.इस अवसर तथा जीवन में आते रहने वाले इस तरह के अवसरों को ,इस लम्बी कविता में विशेष महत्त्व दिया गया है .पछतावा ,पुनरागमन जैसे शब्दों में यही भाव व्यंजित है .वापसी – जैसे भाव कविता में बार-बार लौटते हैं .आशा-निराशा के बीच झूलती मनःस्थितियों की लहरें हैं .पिता-पुत्र के संबंधों को मूलतः द्वंद्वात्मक ढंग से न देखकर संयुक्त या दोहरी जीवनशक्ति के रूप में देखा गया है . ‘क्षमाभाव’ और ‘पश्चाताप’ इसी शक्तिके द्योतक हैं.” २५  
 “अच्छा हुआ तुम लौट आये
मेरे जीवन में,
लेकिन जानता हूँ
नहीं आ सकोगे
-चाह कर भी नहीं –
वापस मेरे युग में !”२६

    कुँवर नारायण के इस काव्य में विषय वस्तु के बिल्कुल विपरीत एक गजब की सहजता और भाषा प्रवाह है. कहीं कोई शब्द अपरिचित नहीं और अर्थ की गहराइयों के साथ विद्यमान है . पूरी रचना में प्रबंध तत्वों को बहुत चुस्त और व्यवस्थित न रख कर थोड़ा ढीला रखा गया है . इस काव्य की हर कविता अपने में अलग, मगर एक विचार प्रवाह में जुड़ी हुई है.विभिन्न खंड कुछ इस तरह एक-दूसरे में आते जाते रहते हैं मानों उनके बीच विभाजक रेखाएं न होकर अलिखित संधियां हों . विषय गम्भीरता के साथ सहजता का यह अद्भुत संयोग महान कवि तुलसी की याद दिला देता है. आज के काव्य परिदृश्य में जबकि वर्तमान और स्थूल दृश्य का यथार्थ ही सब कुछ है, इस भाव भूमि की कविता से गुजरना एक विरल अनुभव है.   कृति में ऋगवेद,  उपनिषद और गीता की न जाने कितनी दार्शनिक अनुगूंजें हैं इसमें, जो कुछ सुनायी पड़ती हैं, कुछ नहीं सुनायी पड़तीं.
“लौट आओ प्राण
पुनः हम प्राणियों के बीच
तुम जहाँ कहीं भी चले गये हो
हम से बहुत दूर –
लोक में   परलोक में
तम में     आलोक में
शोक में   अशोक में :” २७  ( यत् ते यमं वैवस्वतं ...................क्षयाय जीवसे )                                                             ऋग्वेद (मानस))१०/५८


अन्य मुक्तक काव्य
        
       कुँवर नारायण जी वस्तुतः पौराणिक चित्तवृति रखते हैं किन्तु उनका मन उन्मुक्त रस दशा वाला है .उनका काव्य रचना संसार बहुआयामी है जो अपने अन्दर समाज,प्रेम, इतिहास-मिथक आदि उपखंडों को समाहित किये है.कुँवर जी के मुक्तक काव्यों की सूची काफी लंबी है जो चक्रव्यूह ,परिवेश :हम-तुम,आमने-सामने इन दिनों ,हाशिए का गवाह जैसे काव्य -संग्रहों में संकलित हैं .इन सभी काव्य- संग्रहों की रचना प्रक्रिया में कवि की कल्पना ने जो मिथकीय आयाम खोजे हैं, अतीत उत्कंठित रूप से नवता का सूत्रधार बना है .कृष्ण और सुदामा की मित्रता की मिथक कथा को आज के परिपेक्ष्य में कुछ निम्न रूप में कवि ने प्रस्तुत किया है -
“कैसी बाँसुरी ?कैसा नाच ?कौन गिरिधारी ?
जिस महल को तुम
 भौचक खड़े देख रहे
वह तो उसका है
जिसकी कमर की लचकों में
हीरों की खान है .
बहुत भोले हो सुदामा,
नहीं समझोगे इस कौतुक को ....” २८

अपनी  काव्य रचना में प्रयुक्त प्राचीन विषयों एवं घटनाओं को अपनाकर पुरातन को नवीन रूप देने में कुँवर नारायण जी हर तरह  से सफल हुए हैं .कवि ने ऐतिहासिक सन्दर्भों को भी बड़ी ही सूक्ष्मता और सजीवता से मिथकीय रूप में ढाल कर प्रस्तुत किया है .कुँवर जी ने एक भिक्षुक के माध्यम से बुद्ध को आवाज देते हुए लिखा है -
“मिट्टी के खाली पात्र को नहीं
करुणा से भारी उसकी आँखों को देखें
कि हमारे द्वार  पर आया भिक्षुक
कहीं बुद्ध तो नहीं ?”२९

इसमें संदेह नहीं कि कुँवर जी की मिथकीय रचनाएँ अधिकतर समयानुकूल  प्रेरणा और समयनुसार युग बोध के लिए लिखीं गयीं.कुँवर जी के मिथक केवेल भारतीय संस्कृति ,धर्म अथवा परिवेश से लिए गये हों ऐसा नहीं है बल्कि
उन्होंने विदेशों से भी मिथकीय प्रसंगों को उठाया है और उनका प्रयोग बखूबी से अपनी काव्य रचना में किया है.एक कविता ‘ट्यूनीशिया का कुआँ’ में कवि की रचनाधर्मिता का परिचय मिलता है –

“ट्यूनीशिया में एक कुआँ है
कहते हैं उसका पानी
धरती के अंदर ही अंदर
 उस पवित्र कुएँ से जुड़ा है
जो मक्का में है .” ३०
    इस तरह के कई अन्य उदहारण उनके ‘शाहनामा’, ‘नीरो का  संगीत प्रेम’ , ‘इब्नेबतूता’ जैसी कई कविताओं में देखने को मिलते हैं.इसप्रकार कुँवर नारायण जी ने अपनी मुक्तक रचनाओं में कई स्रोतों के कथा प्रतीकों को मिथकीय आयाम प्रदान किये हैं जैसे-  
१.महाभारत कालीन कथा २.रामायण कालीन कथा ३.अन्य पुराण,उपनिषद कालीन कथा ४. समसामयिक कथा
कुँवर  नारायण के अनेक कविताओं में महाभारत कालीन पौराणिक प्रतीकों ,घटनाओं को प्रस्तुत किया गया जो सर्वथा नवीन व्यंजक बनकर आधुनिक जीवन कि स्थितियों के उद्घाटक  बन गये .उनकी ‘चक्रव्यूह’ कविता में महाभारत के युद्ध और अभिमन्यु का प्रसंग को मिथकीय रूप में कुछ इस प्रकार चित्रित किया गया है –
“यह महासंग्राम ,
युग-युग से चला आता महाभारत,
हजारों युद्ध,उपदेशों ,उपाख्यानों ,कथाओं में
छिपा वह पृष्ठ मेरा है
जहाँ सदियों पुराना व्यूह ,जो दुर्भेद्य था ,टूटा ,
जहाँ अभिमन्यु कोई भयों के आतंक से छूटा:”  ३१

          इस प्रकार ‘तुलसीदास-रत्नावली प्रसंग’, ‘अयोध्या १९९२’ जैसी कई मिथकीय  रचनाओं के उदहारण कुँवर नारायण के मुक्तक काव्यों से  लिए जा सकते हैं.उनकी सम्पूर्ण मिथक कविताओं की विवेचना करने पर हम पाते हैं कि   कुँवर नारायण रचित उपरोक्त काव्यों की सबसे बड़ी विशेषता ये है कि इनमें कवि ने भारतीय प्राचीन मिथकों, प्रतीकों को आधुनिक संदर्भो में इस्तेमाल करते हुए समकालीन जीवन से जोड़ कर प्रस्तुत किया है .मिथकों के प्रति गंभीर संवेदनशीलता रखते हुए कुँवर नारायण ने  न तो उन्हें इतिहास बनाने का प्रयास किया है और न ही उनपर अपने समकालीन राजनैतिक आग्रहों को आरोपित करने का .कवि  ने अपने  काव्य के बहाने मिथकों की पुनर्रचना का भी सार्थक प्रयास किया है .इस प्रकार कुँवर नारायण जी के काव्य उनके अद्भुत और अनुपमेय मिथिकीय काव्य चेतना के परिचायक हैं तथा उन्हें मिथक काव्य के इतिहास में मील का पत्थर साबित करने में सफल सिद्ध होते हैं .

                                                                                                                - सुस्मित सौरभ



सन्दर्भ ग्रन्थ सूची :-
       हिंदी काव्य में मिथक का समसामयिक सन्दर्भ : डॉ. सविता मोहन पृष्ठ १ 
       हिंदी काव्य में मिथक का समसामयिक सन्दर्भ : डॉ. सविता मोहन पृष्ठ ३,                                    मिथक : अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम –दिविक रमेश (अभिव्यक्ति ब्लॉग से )
        हिंदी काव्य में मिथक का समसामयिक सन्दर्भ : डॉ. सविता मोहन पृष्ठ ३३
       इनसाइक्लोपीडिया ऑफ रिलीजन  एंड एन्थ्रिक्स
       इनसाइक्लोपीडिया ऑफ सोसल साइंसेज
       नयी कविता के मिथक काव्य :रश्मि कुमार  पृष्ठ १०
       नयी कविता के मिथक काव्य :रश्मि कुमार  पृष्ठ ११
       भारतीय मिथक कोश : डॉ.उषा पुरी
       भारतीय मिथक कोश : डॉ.उषा पुरी
१०  मिथक और साहित्य : डॉ.नगेन्द्र
११    डॉ नगेन्द्र – काव्य बिम्ब पृष्ठ -८
१२  डॉ विश्वम्भर नाथ उपाध्याय –जलते और उबलते प्रश्न
१३  डॉ सत्येन्द्र –मध्ययुगीन हिन्दी साहित्य का  लोक्तात्व्विक अध्ययन पृष्ठ-३९
१४  डॉ कैलाश वाजपेयी –आधुनिक हिन्दी कविता में शिल्प ,पृ.-८२
१५  मिथक और स्वप्न – रमेश कुंतल मेघ
१६  हिंदी काव्य में मिथक का समसामयिक सन्दर्भ : डॉ. सविता मोहन पृष्ठ २
१७  कुँवर नारायण :आत्मजयी भूमिका से
१८  कुँवर नारायण :आत्मजयी
१९   कुँवर नारायण :आत्मजयी पृ. ८७-८८
२०  कुँवर नारायण :आत्मजयी पृ.-९
२१  कुँवर नारायण :आत्मजयी भूमिका से
२२  कुँवर नारायण :वाजश्रवा के बहाने पृ.-४१
२३  कुँवर नारायण :वाजश्रवा के बहाने पृ.-१०० 
२४  कुँवर नारायण :वाजश्रवा के बहाने पृ.-१२०
२५  कुँवर नारायण :वाजश्रवा के बहाने की भूमिका से
२६  कुँवर नारायण :वाजश्रवा के बहाने पृ.-९६ 
२७  कुँवर नारायण :वाजश्रवा के बहाने पृ.-१८ 
२८  द्वारिका में सुदामा :हाशिए का गवाह –कुँवर नारायण
२९  उसे खाली हाथ लौटाने से पहले – कुँवर नारायण
३०  ट्यूनीशिया का कुआँ-कुँवर नारायण
३१  चक्रव्यूह –कुँवर नारायण

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