मन की आँखों से गांव को निहारता कवि

युवा कवि का अनुभव कुछ अधिक नहीं होता किन्तु एक नन्हीं सी चिड़िया के लिए
अनुभव के अनंत आकाश में अपने पंखों को फैलाकर उड़ना ही बहुत बड़ी बात होती है. “मन
गीला नहीं होता” नवनीत नीरव का पहला काव्य-संग्रह जिसमें इस युवा कवि ने अपने मनोभावों के रंगों से एक सतरंगा इन्द्रधनुष बना
डाला है . काव्य-कैनवास पर नवनीत की
तूलिका ने प्रकृति ,प्रेम-विरह, गाँव-घर,मौसम जैसे कई चित्र बड़े ही चटख
रंगों से उकेरे हैं .मैनेजमेंट की पढ़ाई के साथ जुड़े सुनहरे भविष्य का स्वप्न और
अतीत के टूटते गांव के दर्द के भावोद्वेलन के फलस्वरूप नवनीत ने महज २८ वर्ष की
अवस्था में जो भी अनुभव ग्रहण किये, उसकी सहज और सशक्त अभिव्यक्ति उनके काव्य में
हुई है.
कभी-कभी बीती बातें,
खट्टी-मिट्ठी गांव की यादें,
मन को गीला कर जाती हैं.
नवनीत
की काव्य यात्रा ‘गांव की बातों’ से शुरु होकर ‘मन को गीला कर जाती हैं’ के पड़ाव
तक पहुँचती है. ‘बचपन का घर’ कविता में कवि ने अपनी बाल-मनोदशा,बाल-सुलभ करतबों को
शब्दों में व्यक्त करने का हरसंभव प्रयास किया है और उसे सफलता भी मिली है.नवनीत
के पास अभिव्यक्ति का संकट नहीं है और वे अपनी अनुभूतियों को बड़े ही सहज रूप से
परत दर परत अभिव्यक्त करते नजर आते हैं .भोजपुर जिले का ग्रामीण परिवेश कवि के
प्रकृति-प्रेम में बड़ा लाभकारी सिद्ध हुआ तभी तो बैलों के हल के पीछे
भागने,तितलियाँ पकड़ने ,धनखेतों की मेढ़ पर दौड़ने के शब्द-चित्र इनकी कविताओं में इतनी
सजीवता से उभरकर सामने आये हैं. एक आलोचक के विचार कुछ इस तरह थे –एक युवा कवि की
काव्य रचना के मुख्यतः दो ही प्रिय विषय होते हैं एक तो प्रेम और दूसरा गांव .मुझे
आलोचक महोदय के कथन पर तरस आता है. एक युवा भला इन दो विषयों से अपनेआप को वंचित
कैसे कर सकता है.प्रेम एक सनातन अनुभव है
और युवावर्ग के लिए तो यह बिल्कुल नया और अनूठा होता है तथा प्रकृति के दर्शन सही
मायने में गांव में ही होते हैं तो ये दोनों विषय युवाकवि के आकर्षण के केंद्र
क्यों न हों?स्वभावतः नवनीत की लेखनी भी उपर्युक्त विषयों पर ज्यादा चली है . ‘मसूरी’
कविता कवि की अद्भुत शिल्प दृष्टि की
पहचान है .देहरादून में निवास करते हुए मसूरी के पहाड़ों की सुंदरता का अवलोकन कर
उसका मानवीकरण बड़े ही मर्मस्पशी ढंग से
किया गया है . ‘आसमानी छतरी’ कवि के युवा ह्रदय के प्रेम का परिचय देती है
दोनों के जिस्म बारिस में
ऐसे सराबोर हो रहे थे
मानो कोई पाल वाली नाव
बीच समंदर में भींग रही हो
ठण्ड से कांपते –थरथराते
तुम्हारे गुलाबी होंठ भीगकर सफ़ेद हुए जाते थे.
कवि
की जिंदगी उम्र की ढलान पर जैसे जैसे सरकती गयी है,वह अनुभव के आकाश में ऊपर उठता
गया है .धीरे –धीरे गांव के प्रकृति चित्रण का स्थान गांव की टूटन और गरीबी ले
लेती है वहीं प्रेम ,मोहभंग, विलगाव और अवसाद के रूप में परिणत होता जाता है.यह
प्रभाव कवि के अवसाद ,दूसरा महाभारत,शहर का आखिरी आदमी ,व्यथा ,पलायन ,अलगाव जैसी
तमाम कविताओं में दृष्टिगत हुआ है.वहीं बिंदिया ,पिया तुम न आये ,देखो सजनी .....
जैसी कविताओं उनके गहरे सौंदर्य बोध की परिचायक हैं .कहीं-कहीं तो नवनीत की
कविताओं में उर्दू नज्मों और शेर ओ शायरी का प्रभाव भी दिखाई पड़ा है.अपनी प्रखर
सृजनात्मक क्षमता के कारण कवि ने नए शब्द विधान और मुहावरे तक गढ़ डाले हैं .
नवनीत की काव्य दृष्टि बिलकुल ही नयी और
प्रयोगात्मक है.छोटी–बड़ी,तुकांत–अतुकांत जैसी लगभग हर कविता में एक सांगीतिक लय और
गेयता विद्यमान है जो कवि के भीतर के आतंरिक लय को निरुपित करती है .इस
काव्य-संग्रह की कविताओं में मिथक,स्वप्न
,बिम्ब और प्रतीक का समावेश बड़े ही सजग और खूबसूरत ढंग से हुआ है .ख्वाब के
छुट्टे, नैनों के दर्पण ,बेहया-बरसाती हवा ,मन गीला नहीं होता जैसे
प्रयोग,शब्द-चयन की दृष्टि से बिलकुल ही ताजा- तरीन हैं जो पाठक को सहज ही आकृष्ट
करने और भाव विभोर करने में सक्षम हैं.संग्रह में संकलित ‘मन गीला नहीं होता’,
‘सावन का आखिती खत ....., ‘बरसाती हवा’, ‘मजदूर’
जैसी अनेक कविताओं से गुजरते हुए एक सुखद अनुभूति होती है.नवनीत की सूक्ष्म
दृष्टि ,सशक्त अभिव्यक्ति की क्षमता और नवल शब्दों की प्रयोगधर्मिता उन्हें युवा
कवियों में एक महत्वपूर्ण स्थान दिलाती है . कुल मिलकर ये लगता है कि नवनीत अनुभव के आकाश में एक छोटी चिड़िया तो
हैं, लेकिन उनकी उड़ान काफी ऊँची होने वाली है .
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